कालिपसो एक यूनानी लड़की थी | 1832 में जब टर्की की हुकूमत के खिलाफ
रोमानिया में बगावत हुई थी तो वो भी लड़ी थी | इन विद्रोहियों को रूस में
पनाह लेनी पड़ी थी और वहां कालिपसो की मुलाकात पुश्किन से हुई | जहाँ ये
मुहब्बत आबाद होती, परवान चढ़ती ज़मीन का वो टुकड़ा लेकिन कहीं था ही नहीं |
कालिपसो लौटकर रोमानिया आई तो बिना पुश्किन के कोई घर बसाने का उसका मन
नहीं हुआ... मन सन्यासी सा हो गया.. जी उचटना कहते हैं शायद इसको, तो
इन्होने एक गिरजाघर में पनाह ले ली |
गिरजाघर में औरतों का प्रवेश नहीं था..
तो कालिप्सो ने एक मर्द का वेश धारण किया और गिरजा में रहने लगी.. जब किसी
तरह भी पुश्किन को नहीं पा सकी तब शायद खुद ही अपनी जिन्दगी ख़त्म की थी..
एक ख़त छोड़ गई की वो कोई मर्द साधू नहीं एक बदनसीब औरत थी !!
सुना है गिरजा में आज तक कालिपसो की खोपड़ी संभाल के रखी हुई है | छू आना
कभी बालिके.. हमारी किस्म तो समझ आ ही गई होगी.. मना ही लेंगे मानते मानते
(21 September, 2014)
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