“सर
आप कॉफ़ी लेंगे?” पेंट्री वाला पूछता है | हम अपराधियों सी शक्ल बनाए ना
में सर हिला देते हैं | मेरा ध्यान नींद पूरी करने पर था वो तन्द्रा तोड़ना
चाहता था | खिड़की की तरफ सर करके हमने चादर से मुंह ढक लिया | आँखे बंद
हुई, नींद आई, और वो फिर आँखों के आगे आई | आज फिर अपना थ्री क्वार्टर बांह
वाला वही गुलाबी कुर्ती पहना था |
पार्क की बेंच पर हम पास भी थे, जान पहचान की आबादी से दूर भी थे | उठके खड़े भी हुए
थे दोनों, और चल भी दिए थे, फिर दूसरी बेंच पर जाकर बैठ भी गए थे |
तुम्हारे चेहरे पे छलक आई पसीने की बूंदों की हल्की महक भी आ रही थी, और
तुम्हारी लम्बी साँसे तेज़ भी होती जा रही थीं | वो तुम्हारे कंधे पे हाथ
रखकर तुम्हें पास लाना याद है | तुमने चेहरा घुमा लिया था, हल्का सा, इनकार
जैसा | जज्बात जरा थम से गए थे, हाथ पकड़ के रोका था हमने | इस बार थोड़ा
ज्यादा भरोसा था नजरों में, कुछ ऐसा ही सोच के दिल को दिलासा दिया और देखा
किये, वो सवालिया निगाहें, जो आ के थम गई थी मेरे चेहरे पे | अगर थोड़ी
फ़ुर्सत हो तो फिर से आ जाओ न.. देर तो हो चुकि थी हम दोनों को सवाल पूछने
के लिए.. तुम एक बार “ क्या ?” कह देती !! हर रोज़ जैसे कहती हो.. हर बात
पर.. नहीं??
ऑटो वाला पूछता है “सर रेडियो चला दूँ क्या?” ये हर
तरफ से आती हवा ऐसी लगती है जैसे तुम बालों में उँगलियाँ फिराती हो, मगर
जालिम जमाना, मुहब्बत की राहों में दिवार तो खड़ी करेगा ही.. हम याद कर लेते
हैं तुम्हें याद करके, तू गाने बजा ले यार !! चल लगा ले मिर्ची (रेडियो
मिर्ची) हम मुस्कुरा लेते हैं |
दुर्गा पूजा में फिर छुट्टी है, जरा देर से आयेंगे, बस दो चार दिन का चक्कर | अब क्या है की थोड़ी देर तो होगी.. तुमसे मिलने आते आते
(08 September, 2014)
Labels: Litrary musings