दो सहेलियाँ थी.. साथ साथ खेली बड़ी हुईं | एक की शादी हो गई राजभवन के
माली से और दूसरी की पड़ोस के गाँव में मछुआरे से.. समय बीता तो एक पक्की
मालिन हो गई दूसरी मछुआरिन..मछुआरे दिन भर मछली पकड़ते हैं और परिवार की
महिलाएं मछली बेचतीं हैं हाट में.. मालियों में भी होता है ऐसा ही ..
महिलाएं हाट-बाजार में दूकान संभालती हैं और फूल उगाने का काम मर्दों का..
अब गाँव में ज्यादा कमाई तो होती नहीं थी सो एक दिन मछुआरिन ने कहा मैं
राजधानी में मछली बेच आऊं तो कुछ ज्यादा कमाई होगी, और अगली सुबह वो
पहुँच गई अपना टोकरा मछली भर के शहर के बाजार में.. बिक्री तो अच्छी हुई
मगर शाम ढल आई | मछुआरिन अपना भरा बटुआ ले के गाँव जाने की हिम्मत नहीं
जुटा पाई.. अब याद आई उसे अपनी मित्र मालिन की.. तो मछुआरिन पहुंची मालिन
के घर..
अपनी पुरानी सहेली
को देखकर मालिन भी खुश तो बची हुई मछली बनी रात के खाने में ढेर सी बातें
हुई.. और काफी रात तक सब बातें करते रहे जैसा की होता है, फिर लोग सोने
चले.. अगली सुबह फिर काम भी था.. अब मालिन को ख़याल आया की ज्यादा कुछ तो है
नहीं मेरे पास मगर सहेली के बिस्तर के आस पास फूल तो सजाये ही जा सकते
हैं.. तो वो ढेर सारे फूल ले आई.. बेला, चमेली .. मोगरा.. और सजा दिए सब
मछुआरिन के बिस्तर के पास.. सारा इंतज़ाम देख सुन कर मालिन तो गई सोने और
मछुआरिन को नींद ही न आये .. कभी इस करवट कभी उस करवट.. बेचैन हुई जा रही
थी खुशबु से... आखिर वो उठी और अपना मछली वाला टोकरा लायी | ढका अपना सर उस
से और आराम से मछली की गंध में सो गई..
बिहार के उपचुनाव के नतीज़े
आये हैं.. अब क्या है की आदत तो सड़ी सी बदबू की है, खुशबु हज़म नहीं हुई हम
से.. साला बड़ी आफ़त थी, न कोई लूट मार, न कोई डाका, हत्या, गोलीबारी की खबर
तो पहले पन्ने पे देखे जमाना बीत गया था.. न कोई चारा खा रहा था न अपहरण का
कुटीर उद्योग.. न कोई अजित सरकार जैसे विधायकों को गोली मारता था न JNU के
छात्र नेताओं को सरे बाज़ार 47 से भूना जा रहा था.. बड़ी परेशानी थी भैया
बड़ी परेशानी.. कभी इस करवट कभी उस करवट.. सो लालू को लाने की कोशिस की है
फिर से..
अब टोकरे से ढक लिया है मुंह.. सड़ी हुई बदबू में चैन से सोयेंगे.. आह.. वाह.. मज़ा आ गया...
(25 August, 2014)