एक बार की बात है की महावीर और उनके शिष्य कहीं जा रहे थे | कच्ची सड़क
होती थी और किनारे कई पौधे भी होते थे | रास्ते के किनारे एक ऐसे ही पौधे
को दिखाकर गोशालक ने पूछा गुरूजी इसमें फूल आयेंगे? महावीर कुछ देर तक उस
पौधे को देखते रहे फिर कहा, हाँ वत्स आयेंगे..
गोशालक हंसा और पौधे
को उखाड़कर फेंक दिया | गुरु शिष्य आगे चले, बरसात का मौसम था और अगले कुछ
दिनों तक बरसात होती रही | कुछ पांच सात दिन बाद जब महावीर और गौशालक उसी
रास्ते से लौटे तो देखा की बारिश में पौधा दोबारा जड़ पकड़ चुका है
| और तो और एक बड़ा सा फूल भी खिल रहा था पौधे में !!
महावीर ने समझाया, जब मैं चुपचाप इसे देखता रहा था तो ये देख रहा था की
इसमें आत्मशक्ति कितनी है ? क्या जीने की तमन्ना है इसमें ? फूल को जन्म
देने की क्षमता कितनी है ? क्या आंधी तूफ़ान के सामने ये शक्ति बनी रहेगी?
लगा की है !! इसलिए कहा की फूल आयेंगे...
ये कहानी जब पढ़ी थी तो लगा था ऐसे बदतमीज़ शिष्य को लात मार के भगाया नहीं
महावीर ने? बाद में समझ आया की अच्छे शिष्यों को पढ़ाने वाले कई होते हैं
शायद ऐसे शिष्य ही किसी राजकुमार को महावीर और किसी गौतम को बुद्ध बनाते
हैं..
फिर सचिन को खेलते देखा.. तो ये भी समझ आ गया की चाहे कितना
भी लोग उसकी रिटायरमेंट का शोर मचा लें.. ये पहली बारिश में ही जड़ पकड़ लेता
था.. फिर से चिपका देता था सेंचुरी !! तो जिजीवषा बड़ी important चीज़ होती
है भाई...
आंधी तूफ़ान के सामने ये शक्ति बनी रहेगी ?? अगर हाँ तो यकीन मानिये फूल आयेंगे !!
(21 September, 2014)