बारिश का पानी छोटी छोटी नालियाँ सा बनता नदियों की तरफबढ़ता है | आसमान
से गिरा साफ़ पानी थोड़ा मटमैला सा हो जाता है बहते बहते, अब इसमिट्टी को
पानी का नदी तक पहुँचने का संघर्ष कहें या गंदगी? अब योद्धा के शरीर परतो
घाव के निशान भी सजते हैं न, बुरे थोड़ी लगते हैं |
विवाह नाम की
संस्था से उठता विश्वास आज सहजीवन को बढ़ावा देरहा है | इसे स्वतंत्रता की
राह में एक कदम समझिये | समाज की बंदिशों से छुटकारापाने की छटपटाहट है ये,
दहेज़, जाती प्रथा, जैसी जो कुरीतियाँ आ गई हैं विवाह मेंउनका विरोध है |
भारतीय कानून इसे विवाह की तरह ही मान्यता देता है “एक ऐसा रिश्ताजो विवाह
जैसा हो” ताकि स्त्रियों के ख़िलाफ़ घरेलु हिंसा का जो अधिनियम 2005 मेंआया
था उसके जरिये महिलाओं को सुरक्षा दी जा सके | सुप्रीम कोर्ट ने अपने
कईफैसलों में सुनिश्चित किया है की सहजीवन “अविवाहित वयस्क पुरुष और स्त्री
के बीचसम्बन्ध” है | ऐसे सम्बन्ध से जन्मे शिशु को भी उठने ही अधिकार
कानूनन मिलते हैंजितने की एक विवाह से जन्मे शिशु की | ये कोई आया राम गया
राम वाले रिश्ते का फैंसी नाम नहीं है, वयस्कों के बीच का फैसला है |
दिल्ली
हाई कोर्ट का मानना है की सहजीवन में बंधन नहीं है,अगर दोनों लोग अलग हो
रहे हों तो कोई कानूनी पाबन्दी नहीं लगाई जा सकती दोनों पर |अगर एक पक्ष की
मर्ज़ी न हो साथ रहने की, तो वो अलग हो सकता है | सहजीवन में ध्यानदेने
योग्य है की :
a. जोड़े को समाज के सामने अपने को युगल रूप में प्रस्तुत करनाहोगा |
b. दोनों की आयु विवाह योग्य होनी चाहिए |
c. विवाह योग्य दूसरी शर्तें भी पूरी करते हों दोनों, जैसेदोनों का अविवाहित होना भी जरूरी है |
d. एक साझा घर होना चाहिए दोनों का और दोनों लोग एक उल्लेखनीयसमय के लिए साथ साथ रह रहे हों |
सिर्फ सप्ताहांत साथ गुजरने वालों को सहजीवन नहीं कह सकते |
कोर्ट
का ये भी मानना है की किसी को सिर्फ शारीरिक जरूरतों के लिए “ रखैल ” की
तरहया नौकर की तरह रखना और उसका खर्चा उठाना किसी भी तरह सहजीवन नहीं है |
विवाह
भारतीय उपमहाद्वीप में अक्सर परिवार की सहायता से तयकिये जाते हैं | आज
इसमें परिवारों के सामाजिक स्तर का मिलान किया जाता है |भारतीय ग्रन्थ ऐसा
होता नहीं दिखाते, चाहे सती का शिव से विवाह हो या सावित्री कासत्यवान से,
दोनों में पति पत्नी के सामाजिक और आर्थिक स्तर में काफी अंतर था | आजजब
सती सावित्री के उदाहरण के साथ बराबर वालों से विवाह की सलाह दी जाती है तो
पढ़ालिखा युवा वर्ग उसे पचा नहीं पाता |
कई जगहों पर तो वधु को
विवाह पूर्व वर को देखने की भीअनुमति नहीं, रामायण का पुष्प-वाटिका प्रसंग
कुछ और ही कहानी सुनाता है | खापपंचायतों के फैसले के साथ जब कृष्ण के
सुभद्रा को रथ हांकने की सलाह की याद आती हैतो बड़ा ही अजीब लगता है सुनकर |
गंधर्व विवाह तो होते थे पौराणिक काल में भी, चाहेनल-दमयंती की कथा
हो या शकुंतला के जन्म और विवाह की कथा, सहजीवन का जिक्र तो आताहै | तो
नयी पीढ़ी की ओछी सोच कहके इस मसले को टरकाया तो नहीं जा सकता | विवाह
कीकमियों को उजागर जरूर कर रही है ये नयी रीत | दहेज़ तो समस्या का सिर्फ
शुरूआती रूपथा, असली समस्याएँ तो लड़कियों की गिनती कम होने के साथ साथ
बढेंगी | अगर एक समाजमें पुरुषों के मुकाबले लड़कियों की गिनती घटती रही तो
ऐसी चीज़ें तो होनी ही थी |कल तक जहाँ लड़के अपनी पसंद की लड़की चुन रहे होते
थे आज किसी से पूछो तो उसे लड़कीकी हाँ का इंतज़ार होता है | लड़कियों की
शिक्षा और उनके स्वाबलंबन के प्रसार के साथसाथ ही अपने लिए स्वयं चुनने का
अधिकार भी अपने आप उनके हाथ वापिस आ गया है |
एक नयी सामाजिक
व्यवस्था की शुरुआत भर है सहजीवन | थोड़े समयपहले तक जब समाज कृषि प्रधान था
और व्यक्ति का जीवन गाँव तक ही सिमटा हुआ था, तबसमाज से बहिष्कृत होना एक
भयानक दंड था | आपको फसलों की बुवाई के समय साथ काम करनेवाले हाथ नहीं
मिलते, फसलों की कटाई के समय सहयोग नहीं मिलता | गाँव की दुकान सेसामान
नहीं ख़रीद पाते | दोस्त रिश्तेदार सब चूँकि गाँव में ही थे तो बात तक
करनेके लिए आदमी नहीं मिलता | आज वो युवा ऐसे सारे बन्धनों से आगे निकल आया
है |आर्थोपर्जन के नए तरीके हैं उसके पास | रहने के घर के लिए परिवार के
साझा घर परनिर्भर नहीं है | मित्र मंडली में अलग अलग व्यवसाय, अलग अलग जाती
धर्म के लोग हैं| उसपे समाज की जबरदस्ती नहीं चलती |
ये एक ऐसे समय की
आहट है, जहाँ व्यक्ति समाज पर निर्भर नहींबल्कि समाज के निर्माण की एक इकाई
की तरह अपने अधिकार स्पष्ट कर रहा है | चाहे वोअर्थोपार्जन के तरीकों में
हो या यौनाचार में, युवा वर्ग आगे निकल आया है | विवाहअब भी होंगे, एक संबल
होता है परिवार का और सब उसे त्याग कर आगे ही आ जाएँ ऐसा तोहोगा नहीं |
हाँ लेकिन अनावश्यक दबाव विरोध को जन्म भी देगा | सहजीवन समाज केरिश्तों की
एक नयी पहचान है, और यह यहीं रहने वाला है, चाहे फिर आपको पसंद हो न हो|