The Politics of Floods

2007 में recession आया था शायद, economist ऐसा कहते हैं.. 2009 में भी कई लोगों की नौकरी गई थी, अचानक मंदी छाई थी उस साल भी.. कैसी हालत होती है उसमे अंदाजा है क्या? अभी हाल में एक एम्बेसडर बनाने वाली कंपनी थी.. बंगाल में !! वो भी सरकारी !! बंद हो गई.. कभी सोचा है क्या हाल हुआ होगा उनके employees का??

नहीं सोचा न !! चलिए हम याद दिला देते हैं .. एक नदी है ब्रम्ह्पुत्रा.. दूसरी है कोसी.. एक को कहते हैं sorrow of north east दूसरी को कहते हैं sorrow of bihar ओहो ये भी नहीं पता था !! भाई कभी न्यूज़ देख लेते.. हर साल ये नदियाँ असम और बिहार को डूबा देतीं है.. कभी "हा हुसैन.." सुना इनपे? नहीं सुना?? अच्छा ये दोनों तो कमाऊ पूत नहीं हैं न.. कौन सी टूरिज्म का पैसा आना है यहाँ से..

साले बिहारी मजदूर ही बने रहें तो अच्छा.. और चिंकी !! वो तो चलती गाड़ी में मज़े लेने के लिए हैं ना !! सरकारी अफ़सर के रिटायर होने जैसा होता है ग़रीब होना.. अचानक सैलरी एक तिहाई नहीं होती सिर्फ़, अचानक से टीवी देखते देखते "पानी देना" कहना भी बंद करना पड़ता है.. पता होता है कोई सुनेगा ही नहीं.. आपकी जेब के पैसे से घर चलना जो बंद हो गया है, खुद से उठो और ले लो भाई, बेकार पुछा और कोई न हिला टीवी के सामने से तो "घणी बेजत्ति हो जावेगी"

ये जो झा, मिश्रा, पाठक दिखते हैं न सरस्वती-चंदरो के नाम में सब के सब बिहारी.. लेकिन बिहार की बाढ़ का किस्सा दिखा के आप शेखुलर घोषित तो कर नहीं सकते अपने आप को !! तो भाई बदनाम न हुए तो नाम कैसे होगा ?? ग़रीब साला डूबा करे.. उसकी हमें घंटा परवाह है.. हमें तो अपनी कलम चमकानी है भैया.. कश्मीर को राष्ट्रिय आपदा घोषित कराएँगे..

ओओ विभीषण !! शाह वाले साहेब !! एक नज़र इधर भी...

(14 September, 2014)