जिस दिन वोट पड़ रहे होते हैं उस दिन या तो ये किसी क्षेत्र में शांति
पूर्वक मतदान हो सके ये ज़िम्मेदारी उठा रहे होंगे | या फिर बॉर्डर पर
पेट्रोलिंग कर रहे होंगे | छुट्टी पर तो होते नहीं की जहाँ की वोटर लिस्ट
में इनका नाम है वहां आ के मतदान कर सकें !! इनसे राजनैतिक अधिकार छिन जाते
हैं जिस दिन ये सेना में भर्ती होते हैं उसी दिन..
जो भीड़ इनपर
पत्थर फेंक रही होती है उनके आगे सिर्फ वो फाइबर ग्लास वाली ढाल लिए खड़े
रहना होता है चाहे सामने वाला कितना भी उकसाए, गालियाँ दे, जूते मारे.. और
फिर एक ही आदेश पर उस भीड़ पर इन्हें गोली चलानी होती है.. जिस भीड़ में
अपने छोटे भाइयों के उम्र के लड़के नज़र आ रहे होते होंगे.. अपने बाप की उम्र
के बुजुर्ग भी दिखते होंगे.. क्या लगता है ? सारे माया मोह के बंधन से ऊपर
उठ चुके होते हैं क्या ये लोग?? इंसान इन्हें इंसान नहीं लगते होंगे?
कौन सा अधिकार होता है इनके पास वो भी बता देना ? बीवी से बच्चों से माँ
बाप से परिवार से कई किलोमीटर दूर बैठे हैं ये लोग | आपकी तरह वीकेंड पर
छुट्टी भी नहीं मिलती | महीने भर ऐसे दबाव में काम कर के देखा है?? बिना
TA/DA के धूप, बारिश, बर्फ में फील्ड में निकल के देखा है? डेढ़ फूट के
howitzer cannon के गोले के सामने खड़े होने के लिए और छः इंच की मशीन गन की
गोली के सामने खड़े होने के लिए तनख्वाह नहीं "Ideology" चाहिए होती है..
एक रेल का डब्बा मिलता है उसकी सीटों पे भी तुम्हें ही चढ़ के बैठना है?
वहां अनुशाषण याद दिलाने वाला इनका कमांडिंग ऑफिसर नहीं होता बन्धु और
इन्हें सैन्य बल कहते हैं.. बल प्रयोग तो करेगा !! गाँधी वादी फौज़ चाहिए थी
क्या?? जवाहिरी तो तैयार ही बैठा है.. जाओ जाओ.. इनविटेशन कार्ड छपवा
लो...
गजवा ए हिन्द का न्योता भी दे आना !!
(10 September, 2014)