जब छोटी थी तो
तारे गिनती थी उँगलियों पे, गिनती तब दस तक ही आती थी | लेकिन तारों के ढेर सारे दोस्त
होते, छोटे-छोटे सपनों जैसे, बहुत सारे | चाँद मगर आसमां में एक ही होता था, मुह
फुलाये, सबकी तरफ पीठ किये, नाक सिकोड़े, अकेला खड़ा होता था | बोरिंग कहीं का, उसे
मैं अंगूठे से गिनती.. एक.. और फिर अंगूठा भी दिखा देती थी, रहो अकेले बोरिंग कहीं
के | उपयोगी अंगूठा..
अब अंगूठे से
नंबर डायल होते हैं.. लास्ट डायल्ल्ड की लिस्ट में शुरू का नाम ही तो है | फिर
डायल करते ही काट भी देती हूँ | अब कैसे शुरू करूँ, क्या बात करूँ ? कितने सवाल
हैं.. कैसा होगा ? क्या कर रहा होगा? नहीं ! ये तो पता है, दफ्तर से लौटा है
किताबें ठीक कर रहा है अपनी.. मिस्ड कॉल कर लूँ क्या? फिर से डायल करती हूँ..
लेकिन वो अपनी तरफ से भी तो कर सकता था न.. अकडू कहीं का.. फिर अंगूठे से ही काट
देती हूँ.. इस बार अंगूठा दिखाया नहीं लेकिन | थोड़ा कम उपयोगी अंगूठा..
गर्मियों की
दोपहर और तुम्हारे सीने पे सर रखके लेटी होती.. कुछ जागी कुछ सोयी सी.. तुम
हथेलियों पे स्केच पेन से जाने क्या क्या बनाते.. मेरे हंसने पे छोटी होती आँखों
का तुम्हें पता होता.. यूँ ही कभी भर आई आँखों को हथेलियों से सहलाते.. फोन फिर भी
मैं हर थोड़ी देर में देखती हूँ, कहीं कोई call miss तो नहीं हो गया.. कोई नयी call
नहीं, वही पुराने सारे नंबर मुंह चिढ़ा देते हैं.. कोई पूछता नहीं की हमेशा से ऐसी
ही थी क्या.. फिर इतनी देर से
क्यूँ मिली? पहले नहीं मिल
सकती थी.. अपनी आँखे मैं खुद ही पोछ लेती हूँ.. इस बार काम नहीं आया अंगूठा..
बारिश शुरू हो गई
है, मन पहले ही कुछ भीगा भीगा सा है.. अकेले छत् पर भीगने कौन जाए.. आस पास की भीड़
तो जैसे भूल ही गई है हमें.. दिन ढल भी गया और कोई miss call भी नहीं.. रेल की
पटरियों जैसी क्यूँ नहीं चलती जिन्दगी? बिना उलझे.. सीधी .. सरल.. फिर नए शहर की
अबूझ सी नयी पहेलियाँ भी तो होती हैं.. नयी भीड़.. नयी रौनक भी.. तो क्या कन्फर्म हो
गए टिकट का शोक मनाएं? ये अपने को ही मुह चिढ़ाता सा अंगूठा..
(20 August, 2014)