चालुक्य वंश
पिछली पोस्ट में राजा हर्षवर्धन का जिक्र था और ये भी की
300 में से वो सिर्फ एक युद्ध हारे थे | उस एक हार के लिए चालुक्य वंश के राजा
जिम्मेदार थे | हाम्पी की वास्तुकला भी इन्ही राजाओं की देन है, और कन्नड़ के एक
भाषा के तौर पर विकास के लिए भी ये राजा ज़िम्मेदार हैं | वेश्यावृति को क़ानूनी तौर
पे मान्यता देने वाले दुनिया के सबसे शुरुआती राजा भी चालुक्य वंश से थे |
पता नहीं कहाँ खो गया इनका जिक्र ? ढूंढें नहीं मिलता आज !
पल्लव वंश
पल्लव वंश के राजाओं ने चालुक्य राजा को पराजित कर दिया |
शायद हर्षवर्धन से लड़ने के बाद उनकी सैन्य क्षमता कम हो गई होगी | नर्मदा के
दक्षिणी हिस्से पर पल्लव वंश का शासन क़रीब 150 वर्ष रहा था | महाबलीपुरम का मंदिर
इन्ही राजाओं ने बनवाया था |
मंदिर वस्तु कला का अद्भुत नमूना तो है ही साथ ही ये ध्यान
देने लायक है की कहा जाता है की मंदिर का काफी हिस्सा समुद्र में डूबा हुआ है |
अगर ऐसा है तो आधा जब ऐसा है पता नहीं पूरा कैसा होगा ! जो लोग तमिल लिखते या पढ़ते
हैं वो अक्षर ‘पल्लव ग्रन्थ’ के अक्षरों से जन्मे है, और एक तमिल भाषा ही सिर्फ
‘पल्लव ग्रंथों’ से नहीं आई है | फ़ेरहिस्त जरा लम्बी है :
- तमिल
- तेलेगु
- मलयालम
- तुलु
- सिंघली
- मलय
- इंडोनेशिया और थाई भाषा भी
चोल वंश
अंग्रेजी की वो कहावत तो सुनी होगी न “Save the best for
the last”, हमने भी इसीलिए चोल वंश का जिक्र आखिर के लिए बचा के रखा था | मुस्लिम
सल्तनत से पहले के सबसे महान राजा चोल वंश के रहे होंगे | अगर आज की तारीख़ में चोल
वंश होता तो उसमे भारत के हिस्से होते, श्रीलंका होता, बांग्लादेश होता, मयन्मार /
बर्मा होता, थाईलैंड होता, मलेशिया होता, इंडोनेशिया होता, विअतनाम भी होता,
सिंगापुर होता और मालदीव् भी होता |
घूमने के लिए मुझे पासपोर्ट की जरूरत नहीं होती, पर्यटक भी
ज्यादातर हमारे देश आ रहे होते | अदाज़ा लगाने में शायद दिक्कत हो रही होगी, इसलिए
एक नक्शा ढूंढ लाये हैं हम (नीचे नक़्शे का गुलाबी हिस्सा )
भारतीय इतिहास में चोल वंश शायद सबसे पुराना होगा | कुछ तो
इन्हें 300 (BC) में शुरू हुआ मानते हैं, सम्राट अशोक के स्तंभों में इनका जिक्र
दक्षिण के मित्र राजाओं के तौर पर होता है | 1250 के आस पास कभी इस साम्राज्य का पतन प्रारंभ हुआ |
चोलों ने बड़े बड़े मंदिर बनाने की परंपरा शुरू की थी, आज तमिलनाडु में जो विशालकाय
मंदिर दिखते है उनमे से ज्यादातर इनके काल के हैं | 11 वीं शती में कभी राजा राजा
चोल ने तंजोर का ब्रिहदीश्वर मंदिर बनवाया था | कई मामलों में ये मंदिर अनूठा है :
- इसका शिवलिंग अपने
किस्म का सबसे बड़ा शिवलिंग है |
- मंदिर के बाहर
स्थापित नंदी की प्रतिमा भी दुनिया में सबसे बड़ी है |
- मंदिर का आधार
इतना बड़ा है की इसके गोपुरम (शिखर) की छाया ज़मीन पे नहीं पड़ती |
- गोपुरम (शिखर) एक
पत्थर का बना हुआ है जिसका वजन 82,000 किलो के लगभग होगा | 11 वीं शताब्दी में इसे
63 मीटर की ऊंचाई पे पहुँचाना सचमुच मुश्किल था |
- इस समस्या से
निपटने के लिए चोलों ने त्रिकोणमिती का इस्तेमाल किया | करीब बीस किलोमीटर लम्बा
एक ढलवां रास्ता बनाया और हाथियों ने धकेल धकेल के उस रास्ते से पत्थर को छोटी पर
पहुंचा दिया |
- फिर वहां कारीगर
भेजे गए जिन्होंने उस ऊंचाई पर छोटी छोटी मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ बना दी पत्थर पर
| पता नहीं क्यों ? इतना ऊपर तो ज़मीन से नज़र भी नहीं आता !!
कोई आश्चर्य नहीं इस मंदिर को अगर Big Temple कहा जाता है
तो, है ही विशाल !!
इस मंदिर को बनाने के बाद चोलों को संतुष्ट हो जाना चाहिए
था | कई शताब्दियों तक लोग इस मंदिर के लिए उन्हें याद रखते | लेकिन नहीं, इतने से
कोई तसल्ली नहीं हुई उन्हें, राजा राजा के पुत्र राजेन्द्र ने इसी मंदिर की पक्की
नक़ल चिदम्बरम नाम के आज के शहर के पास बनवा दी |
वैसे तमिलनाडु के बाहर शायद ही कोई इस दुसरे मंदिर का नाम
भी जानता हो, इतिहास की किताबों में कभी पढ़ा नहीं जिक्र हमने, गंगई कोंड चोलापुरम
नाम की जगह पे है, चिदंबरम शहर का नाम सुना हो शायद, उसके पास ही है |
बांध और नदियों को मोड़ के सिंचाई की व्यवस्था के बारे में
तो जानते होंगे आप सब | आधुनिक अभियंत्रण का कमाल होता है | चोल राजा करिकालन ने
कावेरी नदी पर 329 फीट का पत्थर का बांध बनवाया था पहली शताब्दी (AD) में, पानी
जमा किया जाता था और नहरों से करीब 10,00,000 हेक्टेयर ज़मीन की सिंचाई होती थी चोल
साम्राज्य में | ज्यादातर दुनियाँ उस ज़माने में शिकार के बाद मांस को पकाना भी
नहीं जानती थी |
ओह हाँ !! उनकी बनाई नहरों की व्यवस्था से आज भी सिंचाई
होती है, कोई नयी व्यवस्था नहीं है जो आज इस्तेमाल हो रही है, उसी पुराने वाले को
थोड़ा सुधारा गया है |
हमारे इतिहासकार पता नहीं क्यों इन बांध और नहरों का जिक्र
भी भूल गए |
शांतिप्रिय, जन विकास के कार्यों में जुटे राजा लग रहे हैं
चोल ? आईये उनके दुसरे कारनामे देखते हैं | छठी शताब्दी में इनके पास नौसेना थी,
सलामिस की जंग पहली ऐसी जंग थी जो पानी में लड़ी गई और उसके लिखित दस्तावेज़ भी
मौजूद हैं | उनकी नौसेना, पैदल सेना से बिलकुल अलग थी, प्रचलित प्रथा की तरह उनके
पैदल सैनिक जहाजों पे चढ़ के लड़ते नहीं थे, नौसैनिक बिलकुल स्वतंत्र इकाई की तरह थे
उनके लिए | सिर्फ युद्ध में इस्तेमाल होने वाले जहाज भी सबसे पहले इन्होने ही
बनाये थे |
जहाज अलग अलग मकसदों के लिए बनते थे, Destroyer जहाज अलग
होते थे और ललचा के ऐसे जहाजों के पास शत्रु जहाजों को लाने के लिए इनके पास “कन्निस”
नाम के जहाज होते थे | “कान्निस” का तमिल में मतलब शायद “कुंवारी” होता है, लुभाने
का तरीका देखिये !! जहाजों के व्यूह की संरचना और पानी में होने वाली लड़ाइयों पर
किताबें लिखी थी इन्होने | सबसे छोटा जहाजों का समूह बारह जहाजों का और बड़े दल तो
करीब 500 जहाजों के होते थे |
जितनी जानकारी उन्हें जहाजों की थी उतने से जब तसल्ली नहीं
होती थी उन्हें तो चीन से मंगाए हुए गुलेल नुमा उपकरण और आग लगाने के संयंत्र भी
जहाजों पे लगा रखे थे उन्होंने | अपने से पांच गुना बड़ी नौसेना की टुकड़ियों को
नेस्तोनाबूद करने के दर्ज़न भर उदाहरण उनकी नौसेना की किताबों में हैं |
निश्चित रूप से चोलों की नौसेना के आने की खबर दुश्मनों को
बाप के मरने की खबर जैसी ही लगती होगी |
कंबोडिया में उस समय श्री विजय का साम्राज्य था, उन्होंने
एक चोल राज्य के व्यापारी का सामान जब्त करके उसे निकाल दिया | पांच सौ जहाजों के
दो जंगी बेड़े जवाब देने पहुंचे और श्री विजय की सल्तनत नक़्शे से गायब कर दी | उनके
पड़ोसी से कम्बुज्देश के, जब उन्होंने श्री विजय का हाल सुना तो एक सजा धजा सोने से
लदा रथ भेजा और हाथ जोड़े पहुंचे | इस देश पर उन्होंने एक तीर भी नहीं दागा था |
कहा जाता है की गलती से दिशा निर्धारण में चोलों से चूक हुई और वो श्रीलंका जा
पहुंचे, बात बात में उनकी नौसैनिक टुकड़ी ने पूरे श्रीलंका पर ही कब्ज़ा जमा लिया !!
इस घटना की सत्यता को प्रमाणित नहीं किया जा सकता, वाकई चूक हुई थी या जान बूझ कर
गए थे ये आज जांचा नहीं जा सकता | लेकिन जैसी उनकी नौसेना थी, पांच सौ जहाजों की
एक टुकड़ी के लिए ये काम कुछ ख़ास मुश्किल नहीं होगा |
अपने अच्छे समय में चोल साम्राज्य के पास क़रीब पंद्रह सौ
युद्धक जहाज रहते थे | कंबोडिया, श्रीलंका, और तमिलनाडु के कावेरीपूमपट्टीनम
(पोमपुहर) में इनके नौसैनिक ठिकाने थे | मालक्का की खाड़ी में समुद्री लुटेरों से
निपटने के लिए चीनियों ने इनकी नौसेना से मदद मांगी थी | ग्रीक किताबों में भी
इनकी नौसेना का जिक्र आता है |
लूट-पाट इन्होने ज़मीन पर भी रुकवा दी थी | दरअसल राजेन्द्र
चोल ने जो मंदिर बनवाया था वो इसलिए बनवाया था क्योंकि ज़मीन पर उसने कावेरी से
गंगा तक का इलाका जीत लिया था | मंदिर के नाम का मोटा मोटा मतलब “गंगा का दमन”
होता है | कहीं अमेरिका में हुए होते ये चोल राजा तो थ्री हंड्रेड जैसी फ़िल्में
बनती इनपर भी, और हमारे यहाँ ? एक पन्ने का चौथाई हिस्सा !!
हमारी इतिहास की किताबों में राजा राज चोल और राजेन्द्र चोल
के अलावा अन्य राजाओं का नाम भी नहीं आता, जबकि 16 चोल राजाओं ने शाषण किया था |
इनके बारे में सारी काम की बातें गायब कर दी गई हैं |
इनके अलावा महाराष्ट्र में शाषण करने वाले राष्ट्रकूट वंश
का भी एक पैराग्राफ का जिक्र है | सिर्फ ध्यान दिलाने के लिए बता दूँ की ये
महाराष्ट्र, कर्णाटक और आंध्र प्रदेश के सबसे जाने माने पर्यटक केन्द्रों के
निर्माता थे | जी हाँ, अजंता, एल्लोरा और एलीफैंटा की गुफ़ाओं की बात कर रहे हैं हम
| कैलाश मंदिर जो की एल्लोरा में है वो तो सिर्फ एक पत्थर को काट कर बनाया गया है
|
ऐसा ही
कुछ यादवों के साथ भी हुआ | इन लोगों ने देवगिरी बनवाया था, बाद में इसे दौलताबाद
बुलाया गया, एक मुर्ख मोहम्मद बिन तुगलक द्वारा | अपनी राजधानी तुगलक देवगिरी
क्यों ले गया था इसके पीछे भी एक रोचक किस्सा है | इतिहास में सिर्फ यही एक किला
है जिसे कभी लड़ाई में जीता नहीं गया है | एक बार अल्लाउदीन खिलजी ने इसपे कब्ज़ा
किया था लेकिन रिश्वत दे कर, लड़ के इसे किसी ने नहीं जीता | यादवों का नाम नहीं
सुना कभी ? कोई बात नहीं अगली किश्त में हम बता देंगे !!