बदामी के चालुक्य वंशजों की जगह लेने वाले थे राष्ट्रकूट |दक्कन के इलाक़े में उन्होंने क़रीब दो शताब्दियों तक राज किया | इस हिसाब से भारतीय राजवंशों में उन्हें प्रमुख माना जा सकता है | चालुक्य जब राजा हुआ करते थे तब ही राष्ट्रकूट छोटे मोटे सरदार हुआ करते थे | थोड़े ही समय में उनकी शक्ति इतनी बढ़ गई की आस पास के चालुक्य वंश वालों को उनसे भय लगने लगा |
चालुक्य राजा किर्तिवार्मन द्वित्तीय ने उन पर हमला कर के उन्हें अपने अधीन रखने की कोशिश की थी | लेकिन इस द्वेष में उसका खुद का सारा साम्राज्य ही समाप्त हो गया | राष्ट्रकूट वंश की शुरुआत के बारे में अलग अलग धारणाएं हैं | कुछ का मानना है की वो किसान थे जिन्हें चालुक्य राजाओं ने सरदार बना दिया था, कुछ अन्य इन्हें भी क्षत्रिय मानते हैं | कुछ का कहना है की ये आन्ध्र के इलाकों से थे, जबकि कुछ इन्हें कन्नड़ मानते हैं जो की बाद में महाराष्ट्र आ गए थे |
पहला राजा जो राष्ट्रकूट था वो थे इंद्र | बेरार के पास अचलपुर नाम की जगह इसके अधीन थी | उसने एक चालुक्य राजकुमारी से विवाह किया और इसके बाद इसका पुत्र दन्तिदुर्ग राजा बना था | एक छोटे सरदार की तरह ही इसने भीशुरुआत की थी और कांची के पल्लवों के खिलाफ़ अपने राजा विक्रमादित्य द्वित्तीय की ओर से लड़ाई में भाग लिया था | उत्तर से आने वाले अरब हमलावरों को रोकने में भी इसका योगदान रहा था | विक्रमादित्य द्वित्तीय की मृत्यु के बाद, दन्तिदुर्ग ने नंदिपुरी (भरूच, गुजरात) के गुर्जर राजाओं पर हमला किया और मालवा के प्रतिहार राजवंश से भी लड़ाई लड़ी थी | जीत से उत्साहित दन्तिदुर्ग ने अपना साम्राज्य मध्य प्रदेश के पूर्वी भागों की ओर बढ़ाया | दन्तिदुर्ग के समय में चालुक्य सम्राट थे किर्तिवार्मनद्वित्तीय, और समझदारी दिखाते हुए दन्तिदुर्ग इनसे सीधा आमना सामना करने से बचता रहा |
लेकिन अपने किसी मह्तात को इतना आगे जाते देखना किर्तिवार्मन द्वित्तीय से हज़म नहीं हो पा रहा था | दन्तिदुर्ग पर उसने 753 AD में हमला कर दिया | किर्तिवर्मन लड़ाई में हारे और उन्हें जान बचा कर भागना पड़ा |
इस तरह दन्तिदुर्ग ने राष्ट्रकूट वंश की विधिवत राजाओं की तरह शुरुआत की |
दन्तिदुर्ग के बाद कृष्ण प्रथम 758 AD में राजा बने | ये या तो दन्तिदुर्ग के पुत्र थे या फिर जैसा की कुछ इतिहासकार मानते हैं उनके चाचा भी हो सकते हैं | कृष्ण के काल में किर्तिवर्मन द्वित्तीय ने दोबारा राष्ट्रकूट वंश को पराजित करने का प्रयास किया | इस बार किर्तिवर्मन को भयानक हार का सामना करना पड़ा और उसका राज्य राष्ट्रकूट साम्राज्य में मिला लिया गया | माय्सोरे के गंगा और वेंगी के चालुक्य राजाओं को उसके बाद राष्ट्रकूट सेनाओं का सामना करना पड़ा | ये दोनों भी राष्ट्रकूट सेनाओं द्वारा पराजित हुए | चालुक्य राजाओं ने राष्ट्रकूट साम्राज्य की अधीनता स्वीकार की, और एक संधि के तहत आगे भी राज करते रहे | कृष्ण (प्रथम) की मृत्यु 773 AD के लगभग हुई | उन्हें एक विजेता के रूप में ही नहीं याद किया जाता, पत्थर को काट कर बने कैलाश मंदिर (एल्लोरा) को बनाने के लिए भी जाना जाता है | उनके बाद उनके पुत्र गोविन्द (द्वित्तीय) ने 773 से 780 AD के बीच राज किया | कई कुकृत्यों में संलिप्त होने के कारण उनके भाई ध्रुव ने उनके खिलाफ़ विद्रोह कर दिया और उन्हें सत्ता से हटा दिया | 780 से 813 AD के बीच राज करने वाले ध्रुव एक अत्यंत सफ़ल राजा साबित हुए | दक्षिण के पल्लव राजा दंतिवर्मन को उन्होंने पराजित किया, चालुक्य राजा विष्णुवर्धन (चतुर्थ) से भी उन्होंने लड़ाई जीती थी | उत्तर की तरफ बढ़ते हुए प्रतिहार राजा वत्सराज को उन्होंने हराया और राजपुताना और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में अपनी सत्ता स्थापित की | फिर उनका ध्यान पूर्व की ओर गया जहाँ पाल राजा धर्मपाल का शाषण था, उन्हें हराकर बंगाल के कुछ हिस्सों में भी उनकी सत्ता हो गई | कन्नौज पर भी उन्होंने कब्ज़ा जमा लिया, इस तरह ध्रुव ने लगभग पूरे ही भारत में राष्ट्रकूट वंश को एक शक्तिशाली साम्राज्य की तरह स्थापित कर दिया |
वृद्ध होने पर उन्होंने अपने तीसरे पुत्र गोविन्द (तृतीय) के लिए सिंघासन छोड़ा, गोविन्द ने 793 से 814 AD के बीच राज किया | उन्हें अपने ही बड़े भाई स्तंभ से लड़ाई लड़नी पड़ी, इस लड़ाई में स्तंभ हारे और उन्हें गंगा के साम्राज्य वाले हिस्से की देख रेख के लिए भेज दिया गया |
इसी बीच उत्तर भारत में पाल राजा धर्मपाल के पुत्र चक्रयुद्ध को कन्नौज मिला, और प्रतिहार राजा का उत्तराधिकार नागभठ्ट द्वित्तीय को मिला | दोनों ने मिलकर राष्ट्रकूट सत्ता को चुनौती दी, और गोविन्द को उत्तर की ओर लौटना पड़ा | राष्ट्रकूट सेनाओं ने भयानक आक्रमण किया और पाल राजा को गोविन्द की अधीनता स्वीकारनी पड़ी, बुंदेलखंड के आस पास कहीं हुए युद्ध में नागभट्ट द्वितीय भी पराजित हुए | जैसे ही गोविन्द अपनी सेना के साथ वापिस लौटे, नागभट्ट द्वित्तीय ने फिर से शक्ति संगठित की और कन्नौज पर कब्ज़ा जमा लिया | राष्ट्रकूट राजा को गुजरात और मालवा से ही संतोष करना पड़ा | गोविन्द ने दक्षिण में कांची तक अपना साम्राज्य फैला लिया था (आज के समय का तमिलनाडु) | श्रीलंका के राजाओं ने भी उनकी अधीनता स्वीकारी |
गोविन्द (तृतीय) इस तरह से राष्ट्रकूट राजाओं में सबसे प्रतापी थे |
गोविन्द (तृतीय) के बाद उनके चौदह वर्षीय पुत्र अमोघवर्ष ने 814 से 878 AD के बीच राज किया | अपने काल में उन्हें कई आंतरिक विद्रोहों का सामना करना पड़ा | हालाँकि वेंगी के चालुक्य राजाओं को पराजित करने में वो सफ़ल रहे लेकिन गंगा वंश ने अपनी सत्ता वापिस ले ली | अमोघवर्ष को एक अच्छा प्रशाषक माना जाता है | उन्होंने मान्यखेत नाम का शहर बसाया | कनारिसी काव्य “कविराज्मार्ग” लिखा भी था उन्होंने | कई धर्म और अन्य विद्वानों को उन्होंने प्रश्रय दिया, जैन “आदिपुराण” और “हरिवंश” के रचिता जिनसेन भी उनके प्रश्रय में थे और महावीराचार्य जिन्होंने “गणितसारसंग्रह” और “सकतायण” की रचना की वो भी उनके राज्य में ही थे |
अमोघवर्ष के बाद उनके पुत्र कृष्ण द्वितीय (878 से 914 AD) का राज्य रहा | अपने पिता के तरह उन्हें भी कई विद्रोहों का सामना करना पड़ा |वेंगी तो वो जीतने में सफ़ल रहे लेकिन, प्रतिहार राजा भोज ने उनसे मालवा और काठीवाढ छीन लिया | चोल राजा भी उन्हें हराने में सफ़ल हुए |
उनके बाद इन्द्र (तृतीय) का शाषण 914 से 927 AD तक रहा | इस दौरान कन्नौज थोड़े समय के लिए जीता और फिर हारा गया | इनके बाद के कई राजा उल्लेखनीय नहीं रहे, गोविन्द (चतुर्थ) जिन्होंने 927 से 936 AD के बीच राज किया और अमोघवर्ष तृतीय ने 936 से 939 AD तक राज्य संभाला | कृष्ण (तृतीय) इनके बाद आये, 939 AD में सत्ता सँभालने के बाद इन्होने खोये हुए राष्ट्रकूट गौरव को फिर से पाने की कोशिश की | उन्होंने चोल साम्राज्य पर हमला किया और कांची और तंजोर को फिर से जीत लिया, गंगा राजाओं ने भी उनकी मदद की | वेंगी उन्होंने फिर से जीत लिया | उनके बाद उनके भाई खोत्तिगा ने 965 से 927 AD के बीच राज्य संभाला | उनके राज के दौरान परमार राजा सियाक ने हमला कर के उनकी राजधानी मान्यखेत्त को भी लूट लिया | उनके भतीजे कार्रक द्वित्तीय जो उनके बाद आये वो एक असफ़ल राजा सिद्ध हुए | उनके अधीन चालुक्य, तैल द्वित्तीय ने राष्ट्रकूट राजवंश का शाषण ख़त्म कर दिया और कल्याण के चालुक्य राजाओं की सत्ता स्थापित की |
धर्म :
धर्म के मामले में राष्ट्रकूट, हिन्दू धर्मावलम्बी थे, वैदिक परम्पराओं के अनुरूप वे कई यज्ञ भी करवाते थे | जैन तीर्थंकरों को भी उनके राज्यमें मान्यता प्राप्त थी | अरब व्यापारियों को अपने धर्म के पालन की छूट थी, और मुस्लिम कई बार ऊँचे पदों पर होते थे |
कला और संस्कृति :
राष्ट्रकूट कई विद्वानों को प्रश्रय देते थे, जिनसेन, महावीराचार्य, पोन्ना, पम्मा, रन्ना जैसे कई विद्वान् उनके काल में राज्य में थे | मुख्य रूप से संस्कृत, प्राकृत और कन्नड़ भाषा का प्रयोग होता था | उनके अभियंत्रण कौशल के नमूने के तौर पर कई मंदिर आज भी है, इनमे एल्लोरा (महाराष्ट्र) में स्थित कैलाश मंदिर प्रमुख है | अमोघवर्ष ने जब एल्लोरा की गुफ़ा मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया था तब 5 जैनियों के लिए, 17 हिन्दुओं केलिए और 12 बुद्ध के अनुयायियों के लिए तैयार किये गए थे | ये भी उनकी धार्मिक सहिष्णुता को उजागर करता है | कुछ लोगों का मानना है की मुंबई के पास की एलीफैंटा की गुफाएं कलिचुरियों ने बनवाई थी लेकिन कुछ उन्हें भी राष्ट्रकूट काल का ही मानते हैं |
कर्णाटक के काशी विश्वनाथ मंदिर और पत्तदकल के नारायण मंदिर को UNESCO ने विश्व धरोहार घोषित कर रखा है | इनके अलावा धुमेर लेना, और जोगेश्वरी के मंदिरों जैसे अनगिनत निर्माण इनके करवाए हुए हैं | परमेश्वर मंदिर कोन्नुर में, सवादी का ब्रह्मदेव मंदिर, रोन का मल्लिकार्जुनमंदिर, कक्कानुर का नव्लिंग, हुली का अन्ध्कारेश्वर, लोकपुरा के जैन मंदिर, सब इनके ही काल के हैं |
अर्थव्यवस्था :
मुख्यतः इनकी अर्थव्यवस्था खेती पर निर्भर थी | कपास सबसे प्रमुख उत्पाद था, इसके अलावा पान, नारियल और चावल की खेती भी होती थी | मुस्लिन के कपड़ो के कारखाने पैठन, वारंगल में, सूती कपड़ो का उत्पादन भरूच में होता था |
सुगंधी, इत्र इत्यादि के निर्यात का कारोबार ठाणे के बंदरगाह से होता था | हीरे और तांबे की खदाने भी थी इनके पास, मान्यखेत और देवगिरीहीरे के कारोबार के लिए जाने जाते थे | घोड़ो का व्यापार भी होता था | इनके सिक्के अक्काशाले में बनते थे जो की चांदी और सोने के होते थे | इनके सरकारी टैक्स कीदरें आठ से सोलह प्रतिशत के बीच थीं जो की युद्ध के समय बीस प्रतिशत तक बढाई जाती थी |