थोड़ी हक़ीकत, थोड़ा फ़साना !!

किसी ग़रीब जुलाहे की छोटी सी बच्ची थी, होगी कोई आठ नौ साल की ! "हजूर, एक दू दिन ले काम दे देते.." कहते हुए उसका बाप हाथ जोड़े खड़ा हो गया | काफी देर से दुआरे पे बैठा था | अब सबसे बड़े हैं भाइयों में तो हुकुम तो मेरा ही चलना था..

इतने में बड़ी चाची गुजरीं वहीँ से, कहने लगी, आओ आओ.. कुछो काम कर लेती है क्या ये ?? इतने में जोलाहा फिर दोहरा हो गया .. हाथ तो पहले से ही जोड़े खड़ा था .. चिल्लाया "जी जी सर सब काम कर लेती है घर के .. रोटी उटी तो नाइ उतना बढ़िया लेकिन चूल्हा जोड़ना जानती है.." अब जोलाहे को पता नहीं था की चाची को मैडम कहना चाहिए सर नहीं लेकिन मेरा अंग्रेजी सिखाने का मूड नहीं था |

हम आगे चल दिए बात आई गई हो गई | अगली शाम लौटे तो साढ़े सोलह दांत निकाले, झपट के चप्पल उतारते ही कोई पागल चप्पल ले के भागी और सीधा रख के आई रैक पर | चप्पल हम दरवाजे के पास वाले रैक पर ही रखते हैं, ये किसने दिन भर में सिखा दिया पता नहीं |

दिसंबर का महिना था और फटी सी फतुही में काम में लगी थी लड़की, हर दो चार मिनट पे झाँक के जाती की कहीं किसी काम में हमें उनकी जरूरत न पड़ गई हो | अब तो अपनी प्लेट खाने के बाद चौके तक सिंक में पहुँचाने पे भी आफ़त हो गई | डेढ़ फुट की तो थी और हमेशा कुर्सी के पीछे खड़ी नज़र आये |

अगली सुबह हुई तो एक नयी आफ़त ले के मैडम चढ़ गई हमपे | नहा के निकलते ही नजर आ गई की कोने में दुबकी खड़ी है | हमने अंदाजा लगाया, जरूर ब्राम्हण की कोई चीज़ छू ली है और जैसे की बाकिओं को मार पड़ते देखी है तो उसी मार के डर से मेरे कमरे के कोने में छुपी खड़ी है | हमने पुछा क्या छू लिया ?? न तो ऊँगली हिली न आवाज़ निकली नजर घूमी पलंग पे रखे शर्ट की तरफ |

मेरी समझ में नहीं आया, पुछा क्या किया? फाड़ दिया, या जला दिया है, मेरी शर्ट को? मुंडी ऐसे जोर जोर से न में हिली, और ये बड़े बड़े आंसू टपकाने शुरू !! अब भैया लड़कियों के आंसू !! हमने कहा चलो शर्ट ही देख लें !! फिर समझ में आया की बच्ची मेरे तैयार होने के लिए अपने हिसाब से कपड़े सजा के बैठी है |

खैर, उसे कमरे से बाहर निकाला और अपने फ़ोन में जुट गए | सुबह सुबह दर्ज़न भर फ़ोन निपटने होते हैं | ज्यादातर जान पहचान वालों से आधी हिंदी आधी अंग्रेजी में बात होती है | कुछ एक से सिर्फ अंग्रेजी में | कमरे से निकले तो पानी का ग्लास लिए लड़की फिर दरवाज़े पे खड़ी थी |

घर से बाहर निकलने के बाद घर की याद कहाँ आती है | दो दिन का टूर था फिर saturday और sunday | अगली सोमवार वापिस आये तो कार से उतरते उतरते में लड़की फिर से हाज़िर ! दोनों हाथों में ड्राईवर के हाथ से बैग समेट के भागी | जितनी देर में सबसे मिल के कमरे तक पहुँचते फिर दरवाजे पे खड़ी थी पानी का ग्लास लिए | पुछा ये क्या है ? तो जवाब मिला बाहर से आने पे पानी दिया जाता है |

पूरी पागल पल्ले पड़ी है ये सोचते अन्दर आये, बुलाया इधर आ और एक पुराना स्वेटर थमा दिया बच्ची को | हाथ उसके नाप से दोगुने थे तो उल्टा कर दिया, गाउन टाइप की ड्रेस पहन के इतराती हुई चल दी बाहर | सबके सामने एक दो मिनट खड़ी हुई, दिखा रही थी शायद | कुछ ने भगा दिया कुछ बुढियां हंस पड़ी उसके इतराने पर |

हमारे पास समय जरा कम था | वापिस लौटे तो भूल ही गए | अगस्त में वापिस जाना हुआ | पुछा वो छोकरी कहाँ गई ? नाम हमने कभी पुछा ही नहीं था |

जुलाई में कोशी में पानी जरा ज्यादा होता है | सबने कहा कपड़े धोने गई थी, आपको याद करती थी छोटे साहेब | नाम फिर पुछा, "कीर्ति" नाम था | आप हमसे भी अच्छे थे बच्चे.. अफ़सोस दोबारा मिलेंगे नहीं यहाँ...

लेकिन फिर कभी.. कहीं और..

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