पहाड़ों पे कोई कमरा (Part 1)

पहाड़ों पे कोई भी कमरा हो, झांकता हमेशा घाटी की तरफ है | छोटा सा कमरा वो भी था, खिड़की पहाड़ की ढलान की तरफ खुलती हुई | चिनार की लकड़ी होती है, पलंग भी उसी का बना हुआ था, अपने शहरों के स्प्रिंग वाले बेड से थोड़ा सा अलग | बगल के कमरे में कोई बंगाली परिवार है पूरा, ढेर से बच्चे हैं, हँसते मुस्कुराते से, सारा दिन शोर मचाते हैं | यहाँ एक ख़ामोशी भी है, उनकी नींद की पता नहीं कैसे, लेकिन शाम ढलते से आ जाती है, फिर सुबह नौ बजे तक भी नहीं खुलती, हमारी कब आती है ध्यान नहीं दिया |
ये पलंग लेकिन एक ही है, दो टुकड़ों का डबल बेड जैसा नहीं | होटल वालों से बात करनी चाहिए थी, शायद थोड़ी और जगह होती तो बेहतर होता | परदे पहले से पीले हैं, सुबह की पीली सी धूप कमरे को अजीब से रंग में रंग देती है | सब एक ही रंग में रंगा हुआ सा, जमते हुए पानी जैसा, हिलता नहीं, पूरा ठहरा हुआ भी नहीं, पता है की एक लहर अन्दर ही अन्दर गुजरती जाती है, सन्नाटा है, पहाड़ों पे क्या चिड़ियाँ नहीं होती, चाह्चाती, कुछ तो आवाज़ आती |
बाल थोड़े से घुंघराले हैं शायद, अब पीठ हमारी तरफ होती है तो नज़र आता है | ये सोफ़ा थोड़ा छोटा है गर्दन टेढ़ी होने, क्या हर बात की शिकायत सरकार, आप तो ऐसे न थे ! पलंग पे चादर सफ़ेद है, हर रोज़ बदल के ये लोग साफ़ वाला बिछाते होंगे शायद | खाना रात का बचा है, इसे खाया जाए | खिड़की का पर्दा खींचने से शायद कमरे का रंग भी बदल जाए, पीला मनहूस सा लगता है, सुबह की लाली कहाँ गई ? ये तो लेकिन खिड़की के सामने ही बुलबुल है ! सिर्फ मेरे कमरे पे नहीं चहकती क्या ? जाने दो उसकी मर्ज़ी ! चिड़िया से जबरदस्ती कौन गाना सुन पाया है ? फिर कभी कहीं और सही |
ठंढ यहाँ अभी जुलाई में भी होती है | कितनी अजीब बात है, नया स्वेटर लेना पड़ेगा | फिर सवाल है की रुके ही क्यों हैं यहाँ, घर चलते हैं | फिर किसी को बताना भी नहीं की हिल स्टेशन ऐसा मनहूस भी होता है | कुछ साल बाद फिर आयेंगे, शायद चीज़ें बदल जाएँ तब तक, बस पीला पर्दा न हो, और ये सोफे बड़े होने चाहिए |
(12 November, 2014)

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