थोड़े दिन पहले के
flipkart का प्रचार तो देखा होगा | उसे Roadblock Advertising कहते हैं, मतलब कुछ
ऐसा करना की प्रिंट मीडिया में भी वो ही प्रचार दिखे, टीवी पर भी, बड़े होर्डिंग और
पोस्टर लगाकर भी वही दिखाया जायेगा, कहीं भी चले जाएँ आप लेकिन दिखेगी एक ही चीज़ |
कोई दूसरा प्रचार आपका ध्यान आकर्षित नहीं कर पायेगा | इस अभियान को, कई अलग अलग
संस्थान मिलकर, एक साथ काम करके अंजाम देते हैं |
इस तरह के प्रचार के ख़त्म
होते ही उसके फ़ायदे नुकसान को जोड़ने की बारी होती है, कितना खर्चा आया, कहाँ कहाँ
खर्च हुआ, कितने लोगों तक बात पहुंची, क्या कम खर्चे या किसी बेहतर तरीके से हो
सकता था ये सब, ऐसे सवालों के जवाब ढूंढें जाते हैं | यहाँ काम होता है Market
Research वालों का, ये वो लोग होते हैं जो काम तो मार्केटिंग में ही करते हैं
लेकिन कभी काम करते दिखते नहीं | ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं होता की ये लोग
आखिर करते क्या हैं !
जिस तरीके का इस्तेमाल
होता है इस काम के लिए वो है TRP | Target Rating Point का छोटा रूप है, इसमें कितनी
बार प्रचार दिखाया गया, कब कितने लोगों तक बात पहुंची, अलग अलग संचार माध्यमों का
क्या असर रहा, और कौन सा तरीका (टीवी, प्रिंट, इन्टरनेट) सबसे फ़ायदेमंद रहा ये
देखा जाता है |
दरअसल उम्मीद सिर्फ
संतुष्ट ग्राहकों से होती है | जब एक संतुष्ट ग्राहक प्रचार देखता है तो वो करीब
23 लोगों तक आपकी बात पहुंचा देता है, ऐसा माना जाता है | दूसरी बात की ग्राहक के
सामाजिक परिवेश में लगभग उसी के आय वर्ग के लोग होते हैं, 5 हज़ार महिना कमाने वाले
के लगभग सारे मित्र 5 हज़ार ही कमाते होंगे और 50 हज़ार कमाने वाले की जान पहचान में
ज्यादातर 50 हज़ार की आय वर्ग वाले ही लोग होंगे | इस तरह आपकी बात आपके ग्राहक
वर्ग तक पहुँच जाती है |
ख़रीदने का सामर्थ्य, और
ख़रीदने की इक्छा भी यहाँ मायने रखती है, जैसे किसी दहाड़ी मजदूर ने flipkart का
प्रचार देखा भी तो क्या फ़र्क पड़ता है ? वो flipkart से कुछ ख़रीदेगा ही नहीं ! वैसे
ही कोई 60 वर्ष की महिला अगर flipkart का प्रचार देखती भी है तो ख़रीदारी करेगी
क्या वो किसी वेब साईट से ? शायद नहीं !
ये TRP का तरीका इसलिए भी
ख़ास हो जाता है क्योंकि इसी के थोड़े से बदले हुए जोड़ घटाव के तरीके से telivision
वाला TRP नापा जाता है | उसे Telivision Rating Point कहते हैं | इधर फेसबुक पर भी
कई बार जब किसी पोस्ट पर कई like, कई comment, ढेर सारे share आने लगते हैं तो हम
लोग कहते हैं की TRP बढ़ गई है भैया !!
लेकिन इस मामले में सोशल
मीडिया थोड़ा सा अलग है, यहाँ आपकी बात वही सुनेगा जिसे थोड़ी सी रूचि हो आपकी
विचारधारा में, या फिर आपको सबको छूने वाले मुद्दे उठाने होंगे, सिर्फ वही दिखाना
जो आप दिखाना चाहते हैं और अपनी कमियों को ढक लेने का तरीका यहाँ चलता नहीं | देर सवेर
पोल खुल ही जाती है | मामूली सा भी झूठ नहीं चलता, ऐसे में बड़ी कंपनियों को अपने
ख़ास सोशल मीडिया मेनेजर रखने पड़ रहे हैं | बुरी हालत लेकिन स्थापित पत्रकारों की
होती होगी, क्या है की अख़बारों में तो निष्पक्षता का दावा कर के लेख लिख डालना
आसान है मगर यहाँ !!
न तो शब्दों में छिपे
व्यंग चलते हैं, न ही आधा सच चलता है, कोई न कोई विरोध का स्वर सामने आ ही जाता है
| ऐसे में कई closed group बनते हैं, वहीँ बैठिये और अपनी बात सिर्फ़ अपने समर्थकों
को सुनाइए ! महसूस कैसा होता होगा इसमें ? प्रवचन देने वाले मठाधीश जैसा ??