हमारे कमरे में हमारा आईना रहता है

मेरे कमरे में एक आईना रहता है | आदमकद है, सामने से गुजरिये तो आपको पूरा का पूरा अपने अन्दर समा लेता है | ज्यादातर वक्त मगर खाली ही रहता है | हमने आज कोने से झाँक कर देखा की अकेले करता क्या है | कुर्सी है मफलर भी है इस वक्त, खाली बैठा है, मफ़लर देख कर मन किया इसपर स्याही फेंक दे, क्या है की रोज़ झूठ भी तो बहुत बोलता है |
कुछ दिनों से समझाने में लगा है की मैं तुम हूँ | लेकिन ये मुझे मेरे जैसा नहीं लगता है | झूठा मगर मेरे ही जितना है, हमें जरूर अपनी प्रेमी समझे बैठा है | हर रोज़ नए किस्से सुनाने बैठ जाता है, जाने कहाँ से इतने किस्से लाता है, ये तो कभी कमरे से बाहर भी नहीं जाता है | जब किसी ने कांट जैसे बड़े लोगों के बारे में कहा था की वो कभी अपने कस्बे से बाहर नहीं गए थे तो लगता था की घर बैठे बैठे इतना कैसे सोचा जा सकता है | आईना देखा तो तसल्ली हुई, पूरे समय खाली होता है सोचता ही रहता होगा | एक ही कहानी दस बार सोच के सुनने लायक भी बना देता होगा |
पूरी बात न सुनने पर नाराज़ होता की नहीं, ये पुछा नहीं कभी | लेकिन अपना प्रेमी तो वो समझता है, हम इसे प्रेमिका थोड़ी समझे बैठे हैं की इसकी नाराज़गी का असर हो हमपे ! सुबह फिर सुन लेंगे इसके किस्से | रात भी इसकी जागते ही कटती है, शायद ठण्ड लगती होगी | शाम में इसे किसी चादर से ढक देने का इंतज़ाम करते हैं | रोज़ की इसकी बातें सुनते सुनते शायद दोस्ती हो गई है इस से, अब फ़िक्र भी करनी पड़ रही है | शायद धीरे धीरे ऐसे ही प्यार हो जाता होगा |
शाम से ही परदे गिराते गिराते नयी नयी बातें बताना शुरू कर देता है | सामने की दिवार पर मेरी ही तस्वीर टंगी है, मेरे न होने पे भी मेरा साया यहीं लहराता रहता है | ठण्ड में शायद इसपे धुंध जमी थी, तभी शायद हमें ठीक से देख नहीं पाता होगा | अब साफ़ कर चुके फिर भी हमें कोई और ही बताता है, हम ऐसे तो थे नहीं कभी जैसा ये बताता है |
नजर नजर का फ़र्क इसको कहते हैं शायद | सब अपनी नजर से दुनिया देखते हैं, तभी “अश्वत्थामा मर गया” कहने पे कोई हाथी की बात करता है और किसी को अपना बेटा समझ में आता है | हम भी लोगों को जैसा समझते हैं वैसे होते नहीं होंगे, कुछ अलग होते होंगे, हमें कुछ और नज़र आता है | लेकिन जैसा आईना दिखाता है वैसे न होने का अफ़सोस होता है कभी कभी, जब इसे हम किसी और जैसे दिखेंगे तो इसका दिल टूट जायेगा | लेकिन आईने का दिल भी कहाँ होता है ? जरूर दिल के बदले ये आईना खुद ही टूटेगा |
लेकिन इसके टूटने पे बड़ी दिक्कत होगी | अपने कमरे में अकेले बैठना होगा बिना किसी के दिन भर के किस्से सुने | अकेले बड़ी बोरियत होगी | शुक्र है की हमारे कमरे में हमारा आईना रहता है |

(30 December, 2014)

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