नैनं छिंदन्ती शास्त्रानी नैनं दहति पावकः

मछलियों की ढेर सी किस्में देखी होंगी, रेहू, कतला, सिल्वर और ग्रीन कार्प, गरय, पोठी, लेकिन interesting वाली होती है मांगुर | अमरीकन मांगुर नाम की एक ब्रीड अक्सर मछली बेचने वालों के पास दिखेगी, काली होती है, कई घंटों तक बिना पानी भी जिन्दा रह जाती है, और मांसाहारी होती है | इसके मांसाहारी होने पे लोगों को दिक्कत क्यों होगी भला ? मेरे दादाजी के भाइयों में से एक को थी | समस्या ये थी की शाम में लौटते ही हम इन मछलियों को खाने के लिए ढेर सारे मेंढक पकड़ के दे देते थे | तो मेरे लौटने के टाइम का अंदाजा होते ही वो छड़ी पटक पटक के मेंढक भगाने में जुट जाते |
अब मेंढक तो होते ही हैं experiment करने के लिए | दो चार (हजार) को मछलियों को खिला दिया तो बुरी बात क्या है भला ? ऐसे भी मांगुर उन्हें खा ही जाती !
एक जो experiment मेंढक पे सबसे अनोखा लगता था वो था उन्हें गर्म पानी में डालना | पहले तो एक बर्तन में पानी गर्म कीजिये, उसमें फिर मेंढक डाल दीजिये | कूद के मेंढक बाहर आ जायेगा | और मेंढक amphibian होता है, नमक मिले पानी में भी अगर उसे डालेंगे तो वो कूद के बाहर आ जायेगा, नमक के पास बिलकुल नहीं रुकता | अगर स्कूल कॉलेज में कभी मेंढक पे चीरा लगाया हो तो आपने देखा होगा की experiment से पहले मेंढक को एक scalpel भर नमक खिला देते हैं, बेहोश करने के लिए |
अब एक दूसरा तरीका आजमाइए, आप एक बर्तन लीजिये उसमे पानी डाल के मेंढक को रखिये | फिर उस बर्तन को आग पे चढ़ा दीजिये | मेंढक अपने आप को पानी के हिसाब से adjust करता रहेगा | थोड़ी देर में पानी इतना गर्म हो जायेगा की मेंढक उसमे उबल जाए | लेकिन अपने को adjust करने के चक्कर में मेंढक बेचारा इतनी एनर्जी खर्च कर चुका होता है की कूद के बाहर नहीं आ पाता | कर के देखिये !
फिर बेचारे मेंढक के पास कोई और option बचता ही नहीं है | कूद के बाहर भी नहीं आ सकते, और उबलते पानी में तो खुद ही उबलेंगे ! मौत दिखती है लेकिन बचने का कोई तरीका नहीं होता | हिल डुल भी नहीं पाता बेचारा मेंढक, वहीँ पानी के साथ उबल जाता है |
ये secularism का funda भी वैसा ही है, थोड़े दिन में आप इतनी एनर्जी खर्च चुके होंगे की इस उबलते पानी से बाहर नहीं आ पाएंगे |
मुस्लिम हैं तो सेकुलरिज्म गुनाह है, इसाई हैं तो ये blasphemy हुई, ऐसा ही है न ? हाँ हिन्दू हैं तो जरूर कीजिये "सेकुलरिज्म" .. लेकिन मेरे दादाजी के भाई भी तो दादाजी ही थे ! मेंढक तो बचा नहीं पाए | आप अपने को बचाने के लिए कोई बढ़िया छड़ी पटकने वाला ढूंढिए | शायद बच जाएँ |
बाकि .. नैनं छिंदन्ती शास्त्रानी नैनं दहति पावकः !!!!
(10 December, 2014)

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