जो राजा साहब कहते हैं वही सही होता है

जैसे लैला कहते ही मजनू याद आता है, हीर के साथ ही रांझा, सोनी कहते ही किसी महिवाल की याद आती है, राधा के साथ ही कृष्ण की, जुलिएट के साथ ही रोमियो शब्द जैसे जुड़ा हुआ है ठीक वैसे ही जब अकबर कहते हैं तो बीरबल याद आ जाता है |
अकबर बड़े मुग़ल सुलतान थे | उनके दरबार में नौ ख़ास दरबारी थे, नव रत्न भी कहते हैं उन्हें | सभी नौ लोगों के कारनामे बड़े बड़े थे | सितार बजा कर संगमरमर पिघला देते थे तानसेन | और आज जो जमीन का चकबंदी का तरीका है वो भी कोई नया नहीं है, नवरत्नों में से एक थे जिन्होंने इस सिस्टम को बनाया था | अबुल फज़ल जैसे लेखक भी थे, हालाँकि वो बड़े बिगडैल माने जाते हैं और बुढ़ापे में अकेले छत्रसाल पे कूद पड़े थे, फिर छत्रसाल के एक ही हाथ में दो टुकड़े भी हो गए लेकिन, आईने अकबरी अच्छी लिखी थी |
लेकिन पता नहीं क्यों अकबर के साथ हमेशा बीरबल का ही नाम आता है | अकबर-बीरबल के किस्से भी बहुत हैं | एक जो याद आ रहा है वो बैगन का किस्सा है, वही सब्ज़ी वाला बैगन !! याद इसलिए रहा क्योंकि बैगन हमें भी फूटी आँख नहीं सुहाता, लेकिन खाना पड़ता है !!
तो हुआ यूँ की अकबर और बीरबल साथ बैठे खाना कह रहे थे और एक व्यंजन बैगन का भर्ता भी था | अकबर को बैगन का भर्ता पसंद आया, कहने लगे वाह वाह क्या भर्ता है, बहुत स्वादिष्ट !! बीरबल बगल में ही बैठे थे उन्होंने भी हां में हां मिलायी, जी हां हुजुर उत्तम स्वाद है | अकबर ने कहा, हां बीरबल बैगन बड़ा अच्छा होता है | बीरबल फिर बोला, जी हां हुजुर, सब्जियों का राजा है ये तो !! देखा ही होगा आपने इसके सर पे ताज भी होता है !!
कुछ दिन बीते एक दिन फिर अकबर बीरबल साथ खा रहे थे और बैगन की सब्ज़ी थी | इस बार अकबर बादशाह को बैगन की सब्ज़ी पसंद नहीं आई !! नाक सिकोड़ते हुए बोले ये बैगन बड़ी बेकार सब्जी है बीरबल ये दुनिया में होनी ही नहीं चाहिए | बीरबल ने फ़ौरन जवाब दिया, बिलकुल दुरुस्त फ़रमाया हुज़ूर, बड़ी बेकार चीज़ है ! नाम भी देखिये कैसा है, बे गुन, कोई गुण ही नहीं होता इसमें !!
अकबर ने सोचा ये क्या अजीब बात है ! तो उन्होंने बीरबल से फिर पुछा, अमां मियाँ पिछली बार तो तुम इसे सब्ज़ियों का राजा बता रहे थे !! आज क्या हुआ ? बीरबल ने छूटते ही कहा, हुजुर नौकर तो मैं आपका हूँ !! बैगन का थोड़ी न ? जो आप कहेंगे वही सही होगा मेरे लिए तो !!
तो जो राजा साहब कहते हैं वही सही होता है |
अब अपने पत्रकार भी तो बेचारे नौकरी करते हैं | क्यों उनसे निष्पक्ष होने की उम्मीद किये बैठे हैं ? राजदीप साहब पिट पिटा कर भी किताब मोदी जी पे ही लिखेंगे | रजत शर्मा पुराने ABVP वाले हैं शायद, Zee के मालिक राज्यसभा की ओर जाते दिखते हैं | दूरदर्शन तो सरकारी था तो वो ऐसे ही दण्डवत होगा | इक्का दुक्का जो सेकुलरिज्म का झंडा उठाये दिखते हैं वो भी "कहीं ना कहीं.. कहीं ना कहीं.." सम्मान, पारितोषिक के लोभ में हैं | तो तरस खाइए बेचारों पर साहब !!
जो राजा साहब कहते हैं वही सही होता है |
(25 December, 2014)

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