भाषा एक अनोखी चीज़ है, ये लगातार बदलती रहती है | सतत प्रवाह की तरह, निरंतर नए शब्द भी इसमें जोड़े जाते हैं| आज की अंग्रेजी देखें तो इसमें कई शब्द मिलेंगे जो पहले नहीं थे, कुछ समय पहले तक तो लैटिन, फ्रेंच और अन्य यूरोपीय भाषाओँ से ये शब्द लेते रहे अब तो हिंदी के शब्द भी शामिल होने लगे है | आश्चर्य मत कीजिये, Thug, Dacoit, Pundit, जैसे कई शब्द हैं जिन्हें आप आसानी से MS Word में टाइप कर के देख सकते हैं | वर्तनी की गलती पर MS Word अपने आप ही जो लाल निशान लगा देता है वो नहीं आएगा | ऐसा ही कुछ हिंदी के साथ भी है, इसमें भी अंग्रेजी के कई शब्द आ घुसे हैं, सिर्फ़ मतलब बदल कर|
Politics अंग्रेजी का एक निरीह सा शब्द है लेकिन किसी को कह दें की “बहुत पॉलिटिक्स कर रहे हो” तो वो बुरा ही मान जायेगा | बड़ी गलती के लिए Blunder mistake कहना हिंदी भाषियों के लिए तो आम है, अंग्रेजी बोलने वाले सोचेंगे की एक ही शब्द दो बार क्यों इस्तेमाल कर रहा है | इसे संस्कृतियों का आपस में घुलना मिलना कह सकते हैं | लेकिन संस्कृतियों के मिलने का एक तरीका और भी है, जैसे शेर किसी हिरण को खा जाए, अब शेर के खा लेने के बाद हिरण कोई अलग तो बचा नहीं | पाचन के बाद शेर के ही शरीर का हिस्सा हो गया |
इस दुसरे वाले तरीक़े के लिए विदेशियों से ज्यादा तो जयचंद और मीर जाफर ज़िम्मेदार हैं | कई लोगों की माफ़ी मांगने और हर चीज़ में अपनी ही गलती देखने की बुरी आदत है | 5000 से ज्यादा साल केभारत के इतिहास में विज्ञान, प्रौद्योगिकी का कुछ विकास हुआ ही नहीं होगा ऐसा पता नहीं क्यों इनके दिमाग में बैठा होता है | इनकी हरकतों का नतीज़ा भी समय समय पर भुगतना पड़ा है |
1997 में Ricetec नाम की एक अमरीकी कंपनी ने बासमती चावल पर पेटेंट करवा लिया था | इसका मतलब था की बासमती की करीब 20 अलग अलग किस्मों को भारत और पकिस्तान के किसान उगा ही नहीं सकते थे | अगर उगाते भी तो रॉयल्टी देकर और किसी अमेरिकी कंपनी से बीज खरीदकर | किसानों को क्या समस्या होगी इसपर जब सरकारों का ध्यान गया तो उन्होंने WTO जैसी जगहों पर इस मुद्दे को उठाया | 2001 आते आते तक इस अनाज के कुछ एक किस्मों को छोड़कर बाकि सबसे पेटेंट हट गया | भारत सरकार ने विरोध के वाबजूद इस मुद्दे को आगे नहीं खीचा और मान लिया की भारतीय हितों की रक्षा हो गई है |
2002 में तात्कालिक सरकार ने एक दल का गठन किया जो योग की मुद्राओं, आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी पद्दतियों में इस्तेमाल होने वाले नुस्खों को सूचीबद्ध कर सके | इसके खिलाफ़ शोर मचाने वालों में सबसे मुखर थे बिक्रम चौधरी जो की देसी फिरंगी हैं और इन्होने गर्म माहौल में योग की 26 क्रियाओं को करने का US Copyright Office में पेटेंट भी करा रखा था | उस समय खबर थी की भारतीय स्वास्थ मंत्रालय इनके खिलाफ योग से सम्बंधित पेटेंट न देनेका प्रस्ताव रखेगा, और ऐसे सभी पेटेंट का विरोध करेगा | 2005 में इस समिति ने बताया की उस समय तक US patent Office ने 134 योग और उस से सम्बंधित पेटेंट जारी किये हैं | इसके अलावा 2315 योग से सम्बंधित ट्रेडमार्क भी जारी हो चुके थे |ब्रिटेन ने कम से कम 10 ट्रेडमार्क, योग के लिए प्रयोग होने वाली वस्तुओं के बनाये थे |
Traditional Knowledge Digital Library जो की 2002 में शुरू हुई थी, उसने अपना काम करीब आठ साल में पूरा किया | इसमें 2,00,000 स्थानीय उपचारों की विधियाँ है जिन्हें मुफ़्त में इस्तेमाल किया जा सकता है | इन्हें किसी ट्रेडमार्क या ब्रांड के अंतर्गत नहीं लाया जा सकता |
इनकी चर्चा हो और नीम की बात न हो ऐसा कैसे हो सकता है ? तो नीम पर अधिकार को वापिस छीनने में हमें करीब 10 साल लगे हैं | नीम और हल्दी के ऊपर से पेटेंट हट जाने के कारण अंदाजन $5 मिलियन (करीब 30 करोड़ रुपये) का नुकसान कुछ कंपनियों को उसी वक़्त हो गया | European Patent Office (EPO) ने 1995 में नीम पर आधारित एक कीटनाशक (fungicide) बनाने का पेटेंट US Department of Agriculture और WR Grace नाम की एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी को दिया था | भारतीय पक्ष को ये समझाना पड़ा की ये जानकारी भारतीय किसानों के पास सदियों से है, और खाने पीने की चीज़ों (अनाज, फल, सब्जियां) के संरक्षण के लिए ये हमेशा से इस्तेमाल होती रही है |
हल्दी की लड़ाई में 1997में Indian Council of Scientific and Industrial Research (CSIR) को सफलता मिली जब उन्होंने घाव ठीक करने में हल्दी के पाउडर के इस्तेमाल का पेटेंट वापिस करवाया| ये पेटेंट 1996 में University of Mississippi Medical Center के दो भारतीय मूल के लोगों को दिया गया था | उनका तर्क था की चूर्ण बनाकर इस्तेमाल करना एक नयी प्रक्रिया है और इसलिए पेटेंट मिलना चाहिए | इस तर्क से उनकी दाल नहीं गली वो अलग बात है |
अब कोई जर्मन कंपनी है जो खादी नाम से अपने उत्पाद बेच रही है | जसी समय गाँधी हुआ करते थे उस समय के जर्मनी से तो उनका शायद कुछ भी न मिले, मगर उनके खादी का नाम कहीं से जर्मन कंपनियों को मिल गया | अब खादी ग्रामोद्योग (KVIC) ने खादी पर “Wordmark” लेने की ठानी है | KVIC अपने उत्पाद का नाम US, कनाडा, यूरोपीय संघ के देशों, CIS देशों और दक्षिणी अमेरिका में नहीं होने देना चाहती | खादी नाम से अभी शैम्पू, साबुन, काजल, और लिपस्टिक जैसे उत्पाद बिक रहे हैं | सरकार ने पुराने महात्मा गाँधी के हस्ताक्षर वाले दस्तावेज अपने मुक़दमे का पक्ष रखने के लिए निकाले हैं | खादी को इस तरह इस्तेमाल करने को सभ्य भाषा में IPR (Intellectual Property Right) violation कहते हैं और शुद्ध देसी भाषा में लूट |
अब शायद कई apologists का मन कर रहा होगा की इस पोस्ट पर लिखें की ज्ञान बांटना हमारी परंपरा रही है | तो भाई आप आधा श्लोक पढ़ के सिखाने न आयें | विद्या दान की वस्तु है, लेकिन दान हमेशा सुपात्र को किया जाता है | जब दोनों ओर से आदान प्रदान होने लगे जानकारी का तब इन्हें दान में देने की बात कीजियेगा | अगली बार जब हिंदी किताबों और विदेशों से आई किताबों की कीमत में ज़मीन आसमान का फ़र्क न दिखे तब सिखाइयेगा | कंप्यूटर की कीमत जब भारत, अमेरिका और दुबई के tech fest में एक बराबर दिखे तब सिखाईयेगा | जिसदिन एंटी वायरस सॉफ्टवेर ख़रीदना न पड़े उस दिन बताइयेगा |
तब तक कीमत वसूलने का मेरा पूरा हक़ है |
(05 December, 2014)