कॉलेज की पढाई के दौरान दो चार प्रेमी युगल तो परीचितों में हमेशा ही रहे हैं। कुछ प्रेमी प्रेमिका एक ही क्लास / एक ही कॉलेज में होते थे तो कुछ ऐसे भी होते थे जो अलग-अलग कॉलेज में पढाई करते थे। जब कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका से मिलने दूसरे कॉलेज जा रहा हो और आप उसके साथ चले जाएँ तो बड़ी मज़ेदार हालत होती है। अगर महिला कॉलेज हुआ जहाँ आप गए हैं तो वहां आपके आस पास से गुजरने वाली हर लड़की आपको बाकायदा नाप नाप कर देख रही होती है। ख़ुसुर-फुसुर इतने जोर से होगी की आपको साफ़ सुनाई देगा “किसके साथ आया है?”, “ओऊ” , “ये भी उसी कॉलेज का है क्या?”, “कैसी अजीब सी कमेंट वाली t-shirt पहनी है !! ढंग के कपड़े नहीं इसके पास ?”। (कहा तो वैसे और भी बहुत कुछ जाता है, मगर public forum है तो कुछ अनुमान के लिए रह जाने दीजिये !! )
आपकी हालत ख़राब होती रहेगी, लेकिन जो प्रेमी प्रेमिका हैं उन्हें आपके बुरे हाल से कोई लेना देना नहीं होता ! अपनी ही दुनियाँ में खोये हैं साहब !! आधे-एक घंटे बाद शायद आपके झकझोरने पर होश आये तो फिर देर हो जाने और पहले ध्यान क्यूँ नहीं दिलाया बे जैसी शिकायत सुनते वापिस आइये ! एहसान तो कोई मानता ही नहीं, इतनी दूर जाने, एक घंटा खाली बैठे इंतज़ार करने और कमेंट सुनने का !
उस से थोड़ी ज्यादा बेहतर हालत उन दोस्तों के साथ होती है जिनकी प्रेमिका शहर के बाहर रहती है |इन जीवों के पास एक रिलायंस to रिलायंस फ्री वाला फ़ोन होता है | यदा कदा उस फ़ोन के सदुपयोग का अवसर हम लोगों को भी प्राप्त होता रहता था | इनका टाइम फ़िक्स होता है, घड़ी के कुछ आठ बजे के आस पास जनाब फ़ोन पर, सारी दिन दुनियाँ से बेख़बर |
ये प्यार की बड़ी अनोखी सी चीज़ है, जितना प्रबल होगा, उतना ही निजी हो जाता है | प्यार करने वालों को आस पास छोड़ दो और फिर उन्हें मतलब ही नहीं रहेगा अपने आस पास के माहौल से, किसी शोर शराबे से, समय का पता नहीं, जगह का भी ध्यान नहीं ! किसी प्रेमी युगल को देख लीजिये, न मिलें तो किसी शादी में आये किसी नव विवाहित जोड़े को देख लीजिये ! किसी और चीज़ से मतलब ही नहीं !! यही जब दूसरों को दिखाने के लिए किया जाता है तो या तो इर्ष्या पैदा करने के लिए किया जाता है, या प्रतिद्वंदिता | दोनों ही चीज़े किसी स्वस्थ रिश्ते के लिए अच्छी तो नहीं ही होती हैं |
प्यार दो लोगों के बीच का मामला है तो उसे सार्वजानिक न हो कर दो लोगों के बीच में ही होना चाहिए| ‘किस ऑफ़ लव” अभियान वाले कहते हैं की ये moral policing के खिलाफ विरोध है |युवाओं पे पहरेदारी करने के लिए हमेशा कोई संगठन और कुछ बुजुर्ग खड़े हो जाते हैं, नैतिकता की दुहाई लिए | और नैतिकता की परिभाषाएं भी समय के हिसाब से तय होती हैं |मेरी दादी को सिनेमाहाल में फ़िल्में देखने जाना, बिगड़े हुए बच्चों के लक्षण लगते हैं | वहीँ छोटे भाई बहन जब मेरे आस पास ज्यादा चक्कर लगाने लगें तो मेरी समझ में आता है की किसी मल्टीप्लेक्स में कोई 3D फ़िल्म लगी है, तभी ये लल्लो-चप्पो की जा रही है |
फिर मामला समझ में आता है की नैतिकता, समय के साथ अपनी परिभाषा गढ़ती है | कभी दो चोटी करना लड़कियों का बुरा माना जाता था | अभी 15 साल पहले जब LML वेस्पा और Honda मोटरसाइकिल में से चुनने की बात हो रही थी तो एक वकील साहब कहते थे की मोटरसाइकिल तो लुच्चे चलाते हैं, स्कूटर शरीफ़ लोगों की सवारी है | और आस पास बैठे सारे बुजुर्ग हां में हां मिला रहे थे !! अब तो फ़िल्में देखने में बच्चों के बिगड़ने, या मोटरसाइकिल चलाने पर हाथ से निकल जाने का ख़तरा नहीं रहता |
यहाँ ये भी दिखता है की लड़कों और लड़कियों के लिए, मापदंड अलग अलग होते हैं | हम बनियान पहने निकल जाएँ तो कोई बात ही नहीं, कोई लड़की निकल जाए सड़क पर तो शायद ट्रैफिक रुक जायेगा |लड़कियां शायद काठ की हांडी टाइप कुछ होती हैं ! जब ये ‘किस ऑफ़ लव’ जैसी घटनाएँ होती हैं, तो इनका विरोध भी होता है | इसलिए ऐसे मुद्दों पर श्री कृष्ण की याद आती है, जिन्होंने अपनी बहन को ही अर्जुन का रथ हांक कर भगा ले जाने की सलाह दी थी !! वैसे सौ प्रतिशत समर्थन तो कृष्ण को भी नहीं मिला था, किसी मुद्दे को कैसे मिलेगा?
पटना में देखें तो आये दिन किसी साइबर कैफ़े में, किसी रेस्तरां में, पुलिस के छापे की ख़बरें आम हैं | इनमे गिरफ्तार होने वाले लोगों पर अक्सर वेश्यावृति में लिप्त होने के मामले लगाये जाते हैं, जो शायद 90 दिन के लिए आपको जेल में डालने के लिए काफ़ी है | तो जब कैफ़े, पब, पार्क, सब छीन लिए हैं moral policing वालों ने तो अब तो ये सब सड़कों पर ही होगा ? अगर किसी आन्दोलन की तरह इसे देख रहे हैं तो मत देखिये | भारतीय समाज से आन्दोलन 20 साल पहले जा चूका है, यहाँ अब आन्दोलन की जगह events होते हैं और सामाजिक सरोकार के नेताओं की जगह पर event manager |
अभी का जमाना rural marketing का और market friendly individuals का हो गया है | 25-30 साल पहले जब राजीव गाँधी और नरसिम्हा राव के ज़माने में विदेशी पूँजी निवेष को बढ़ावा दिया गया था तभी इसकी नींव पड़ गई थी | हमारे केबल टीवी के धारावाहिकों ने बेडरूम का दरवाज़ा जाने कब से खुला छोड़ रखा है | अभी भी अगर आप प्रेम की “पवित्रता” देखने निकले हैं तो साहेब आप 20-25 साल पहले ही अंधे हो चुके हैं |
अगर ये ऐसे न समझ आये तो अखबार, social media या फिर टीवी पर “किस ऑफ़ लव” की दो चार बहसें देख-पढ़ लीजिये | “प्रेम” के साथ जो शब्द इस्तेमाल किया जा रहा है वो है “स्वतंत्रता” | अब स्वतंत्रता का मतलब होता है की आप सब कुछ होने या घटने की ज़िम्मेदारी अपने सर ले रहे हैं ! जरा ये ज़िम्मेदारी डालिए इन event manager और event में शामिल बिरादरी पर ! सब के सब प्यार से पल्ला झाड़ कर खड़े हो जायेंगे | वैसे भी आन्दोलन तो हक़ के लिए होते हैं, कर्तव्यों के लिए तो होते नहीं, चलिए फिर “स्वच्छ भारत अभियान” के कर्तव्यों का मजाक बनाते हुए हम सब भी शामिल हो जाएँ |
मनोरंजन के लिए हैं आज के टीवी समाचार, वो तो इसे बार बार दिखायेंगे ही | असली मज़ा उन बुजुर्गों को देख के आता है जो इसी न्यूज़ के बहाने टीवी पर चुम्बन देखने के लिए चिपके हैं ! “सफदरजंग के मकबरे” से निकल के “इन्द्रप्रस्थ पार्क” पहुँच गया है प्यार | शहर की टूटी इमारतों की जरूरत नहीं रह गई है युवा पीढ़ी को, मिलने की जगह तय करने के लिए उनके पास मोबाइल है, जाने के लिए बाइक भी है | क्यों लगता है की “किस ऑफ़ लव” उनका आन्दोलन है ? या विरोधी उनके विरोध में खड़े हैं ?
अगर ऐसी व्यर्थ की बातों पर ध्यान दे कर असली मुद्दों से ध्यान हटाना है तो अलीगढ़ वाला किस्सा यादकर लीजियेगा | AMU की लाइब्रेरी में घुसने की पाबन्दी हुई लड़कियों पर तो लगभग पूरे देश में विरोध हुआ | लेकिन जैसे ही विरोध शुरू हुआ तो कई पढ़े लिखों के लबादे में छुपे कठमुल्ले भी सामने आ गए ! और तो और यूनिवर्सिटी की छात्राएं भी उठ खड़ी हुई की हमें लाइब्रेरी नहीं जाना ! भई जब तुम्हें जाना ही नहीं तो इजाज़त दे भी दी जाए तो क्या फ़र्क पड़ेगा ? न तुम जाओगी न उसकी वजह से भीड़ बढ़ेगी ! अब सुधार की या शिक्षा के फैलाव की बात से ही अगर इतनी मिर्ची लगती है तो तुम्हारा समुदाय तो पिछड़ा रहेगा ही | वैसे ही इस “किस ऑफ़ लव” के आन्दोलन पे ध्यान दिया तो हम सब के सब भी पिछड़े रह जायेंगे |
प्रेम का अगर सामान्य भारतीय जनमानस के मन में इतना विरोध होता तो फिर ये इक्कीस राज्य उस Honour Killing के विरोध में कानून बनाने एक साथ कैसे आ जाते ? प्रेम के किसी भी “उद्दात अर्थ” से आज की युवा पीढ़ी अनभिज्ञ है क्या ? पंद्रह – बीस साल पहले जैसे जनसरोकारों के आन्दोलन अब भी होते हैं क्या ? हमारे सामने एक रियलिटी शो बिलकुल बिग बॉस जैसा परोसा जा रहा है | जब इसमें मसाला कम पड़ जाता है तो ऊपर से “किम कर्दिशन”का सॉस डाला जाता है | ऐसे ही जब आन्दोलनों में जनता की रूचि ख़त्म हो रही थी तो ये गरमा-गर्म मसाला छिड़का गया है |
इस “किस ऑफ़ लव” और उसके विरोध दोनों को नकार दिया जाना चाहिए | Ignore it !!
(18 November, 2014)