Why Sanskrit ( संस्कृत क्यों ) ?

अब नया हंगामा है की भैया जर्मन की जगह संस्कृत क्यों पढ़ा रहे हैं केन्द्रीय विद्यालयों में ? जर्मन चांसलर एंजेला मेर्केल को सवाल भी उठाना पड़ रहा है की, कहीं उनकी भाषा की बेइज़त्ति तो नहीं की जा रही, भारत में ? ये नया दंगा है media का फैलाया हुआ | UPA जब तीन भाषाओँ के सिद्धांत पर 2011 में गड़बड़ी कर रही थी, तब क्यों नहीं सूझा था ये सब ?

नासमझी भरा UPA का फ़ैसला था, फिर संस्कृत के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बेहतर होने की भी चर्चा चलती रहती है | कहा जा रहा है की जर्मन न होने से भारतीय छात्रों के जर्मन universities में पढ़ने में दिक्कत आएगी, ये भी सच नहीं है, ज्यादातर यूनिवर्सिटी की पढाई, जर्मनी में भी अंग्रेजी में होती है | फिर भी अगर आप जर्मन ही पढ़ने पर तुले हैं तो जर्मन भाषा पे पाबन्दी नहीं है, आप एक अलग भाषा के तौर पर अभी भी इसे चुन सकते हैं |
कुछ ये भी कहते हैं की जर्मन वैश्विक भाषा है, जो की फिर से गलत बात है, अगर यूरोप में भी देखें तो कुछ ही लोग जर्मन बोलते हैं | Siemens जैसी बड़ी कंपनियों के साथ काम करने में तो जर्मन न आने की वजह से कभी दिक्कत नहीं हुई | जर्मनी घूमने चले जाएँ तो अंग्रेजी से काम चल जायेगा, हां शाकाहारी होने की वजह से समस्या आ सकती है | कहीं कहीं से शिकायत आती है की जिन्होंने पहले से ले रखा है जर्मन उन्हें तो समस्या होगी, ये कुछ सही है, लेकिन फिर 2011 से पहले तक तो था नहीं जर्मन | 2011 में संस्कृत को हटा कर जर्मन भाषा लायी गई थी |

तो जब मुद्दे पे आयें तो ये समझ नहीं आता की संस्कृत हटा के जर्मन क्यों ? अरबी, फ़ारसी या स्पेनिश भाषा क्यों नहीं ? ज्यादातर भारतीय मूल के लोग तो वहीँ नौकरी करने जाते हैं ! जापानी क्यों नहीं, रोजगार के अवसर तो वहां भी कई हैं, और सीखने में ये भाषाएँ जर्मन से ज्यादा कठिन हो, ऐसा भी नहीं है | जर्मन को चुने जाने के पीछे तर्क क्या था ? केन्द्रीय विद्यालय की पद्दति सारे देश में एक सी होती है, अलग अलग राज्यों में अलग अलग पद्दति तो अपनाएंगे नहीं, इसलिए एकबार भाषा बदलते ही सारे स्कूल से संस्कृत शिक्षक बदल कर उनकी जगह जर्मन लाने पड़े होंगे और संस्कृत शिक्षकों को कोई और ज़िम्मेदारी दी गई होगी | कोई कपिल सिब्बल सेये क्यों नहीं पूछता की उन संस्कृत शिक्षकों का क्या हुआ ? अचानक वो सब भी जर्मन बोलने लगे क्या ?

कोई केरल में जन्मा होगा तो उसकी पहली भाषा तो तीन भाषा वाले फ़ॉर्मूले के हिसाब से हिंदी हुई, दूसरी अंग्रेजी, और तीसरी हुई मलयालम | ये शोषण नहीं है क्या ? ना हिंदी पट्टी की याद मत दिलाइये, जहाँ से हम हैं वहां “मैथिली” नाम की भाषा चलती है और शायद ही कोई लोग होंगे जो आज इसे लिख सकते हैं (बोलने वाले बहुत से मिल जायेंगे ) | तो जिसे आप त्रिभाषा सिद्धांत कह रहे हैं वो भी जबरदस्ती थोपी हुई ही है | वैसे देखा जाए तो तीसरी भाषा के रूप में मैथिली के बजाये फ़्रांसिसी, तमिल, मलयालम, संस्कृत इत्यादि चुनने का विकल्प हमेशा था मेरे पास | इसमें मेरी मातृभाषा के बजाये ही दूसरी भाषा चुननी होती है, नुकसान किसी भारतीय भाषा का ही होगा, विकल्प कुँए और खाई के बीच चुनने जैसा है | ऐसे में अगर जरूरी भाषा के बजाये जर्मन को एक विकल्प के तौर पे चुनने का मौका मिला है तो अच्छा ही है | अगर प्रयाप्त मांग है तो शिक्षक भी उपलब्ध हो जायेंगे, इसे शायद अर्थशास्त्र में मांग और पूर्ती का सिद्धांत कहते हैं, किसी भी खुले बाजार व्यवस्था में ये होना ही चाहिए |

तीन भाषा का सिद्धांत कहता है की उत्तर भारतीय / हिंदी पट्टी के छात्रों को हिंदी, अंग्रेजी और (हो सके तो) एक दक्षिण भारतीय भाषा सिखाई जाए और दक्षिण भारतीय छात्रों को हिंदी, अंग्रेजी और एक क्षेत्रीय भाषा सिखाई जाए| अब इस से पिछले 50-60 सालों में राष्ट्रिय एकता को कितना बल मिला है ये तो विवाद का विषय होगा, कांग्रेस की नीतियों पर भी सवाल उठाये जायेंगे | लेकिन फ़्रांसिसी या फिर चीनी या फिर जर्मन सिखा कर कैसे राष्ट्रिय एकता को बल मिलेगा ये तो सचमुच समझ में नहीं आता |

किसी भाषा के जरूरी होने के कई कारण हो सकते हैं जैसे :

जर्मन को देखिये तो काफी कम लोगों के लिए व्यापारिक लेन देन की भाषा होगी, कुछ जर्मन, कुछ डच, कुछ स्विस लोगों के लिए, साहित्यिक तौर पर देखेंतो बड़ी ही उन्नत भाषा है ये | लेकिन गुएन्टर ग्रास की  “The Tin Drum” तो पढ़ी है हमने | उसमे जैसी फसलों का, जैसे इतिहास का,यहाँ तक की कशूबिया नाम की जगह और वहां की जिन मछलियों का नाम पढ़ा है उनमे किसी भारतीय की रूचि जगाना जरा मुश्किल काम होगा | Danzig और Gdansk जैसी जगहों का नाम और कहीं पढ़ने में आया हो ये याद भी नहीं आता |

अंग्रेजी विजेताओं की भाषा है, ठीक वैसे ही जैसे किसी ज़माने में अरबी फारसी हुआ करती थी | उनको भारतीय भाषाओँ के साथ मिला के उर्दू बनी, आज वैसे ही अंग्रेजी में अपनी भाषा मिला के हम लोग हिंग्लिश बोलते हैं | भारत के अलावा आयरलैंड, स्कॉटलैंड, जैसी जगहों पर भी अंग्रेजी विदेशी भाषा है, और कॉमनवेल्थ का हिस्सा रहे हरेक देश के लिए भी | जर्मन कभी भारत को जीत नहीं पाए इसलिए जर्मन विजताओं की भाषा भी नहीं है हमारे लिए |

वहीँ अगर संस्कृत को ध्यान से देखें तो एक लम्बे समय के लिए ये भारत की भाषा रही है, साहित्य में भी इसका योगदान कुछ कम नहीं है | अगर आर्यों को विदेशी आक्रमणकारी मानेंगे तो ये विजेताओं की भाषा होगी, और अगर कहीं यहीं का मूल निवासी कहियेगा तो ये हमारी अपनी भाषा हो जायेगी | कई इतिहासकार जैसा की दावा करते रहे हैं, की खय्बर पास के रस्ते से आर्य अपने भीषण रथों पर सवार भारत पर टूट पड़े थे वो आजकल हज़म नहीं होता | एक गलती (जानबूझ कर) की जाती है की संस्कृत प्रचलित लोकभाषा नहीं थी, उन्हें धर्मकीर्ति का लिखा देखना चाहिए (धर्मकीर्ति बौद्ध मतों के प्रचलित और कट्टर प्रवर्तक थे) |

संस्कृत के विरोधी ये भूल जाते हैं की अगर संस्कृत को छोड़ दिया जाए तो संगीत, कला-नाटक, साहित्य का एक बड़ा वृहद् श्रोत वो खो रहे हैं | कई बार किसी न किसी हस्ती को ये कहते हुए भी सुना जाता है की “संस्कृत भाषा Artificial Intelligence के लिए सबसे अच्छी भाषा है” | बड़ी हस्तियों का ऐसा कबूलना काफी प्रभाव डालता है, लेकिन सिर्फ इसी लिए इसे साक्षात् सत्य नहीं मान लेना चाहिए| संस्कृत के साथ LISP या फिर Prolog जैसी प्रोग्रामिंग की भाषाएँ भी इस्तेमाल करनी पड़ेंगी इस काम के लिए |

पाणिनि की संस्कृत (वैदिक संस्कृत नहीं) अभी तक की इंसानी भाषाओँ में सबसे उन्नत है | इसमें व्याकरण में समय, काल, परिस्थिति के हिसाब से परिवर्तन नहीं होता | जो लिखा गया है उसका उच्चारण और अर्थ हर हाल में वही होगा,लिखने का तरीका भी नहीं बदलेगा (जैसे a University और an Umbrella कभी नहीं कर सकते, एक जगह अगर a लगाया है तो दूसरी जगह भी a ही लगेगा) | नियम पक्की गिनती के हैं और उनमे कोई फेर बदल या फिर किन्तु-परन्तु नहीं होता (3959 नियम होते हैं अगर बहुत ज्यादा लग रही है ये गिनती तो इन सबको लिखने में करीब 37 पन्ने लगते हैं, याद करने में शायद महिना भर) |

Chutzpah शब्द जो अभी हाल में किसी फिल्म के लिए सुनाई देता था उसका उचित इस्तेमाल पाणिनि के व्याकरण के लिए होगा | अनंत भावनाओं को एक भाषा में व्यक्त करने का सामर्थ्य गिनती के नियमों में कर देने का उस आदमी ने करीब 2500 साल पहले सोचा था | शायद गणित (mathematics) के असंख्य, अनगिनत का सिद्धांत उस समय भी भारत में चलता होगा |

पाणिनि के किये इस काम को दोबारा से अविष्कार की जरूरत पड़ गई | 1950 में IBM के इंजीनियरों को एक ऐसी भाषा की जरूरत पड़ी जिस से कंप्यूटर को अपनी बात समझाई जा सके | Backus और Naur ने इस काम के लिए “context-free grammar” का फिर से अविष्कार किया (MIT के Noam Comsky ने भी इस पे काम किया था | फिर समझ में आया की पाणिनि ने इनसे 2500 साल पहले ही ऐसा व्याकरण बना डाला था |

आज की सभी प्रोग्रामिंग की भाषाएँ चाहे वो C++ हो या फिरJava, Ruby या Python इन सब को कुछ सौ नियमों को जानने पर लिखा जा सकता है | यही वो विशिष्टता है जिसके कारण parser इन भाषाओँ को “समझ” सकता है, और फिर मशीन द्वारा समझी जाने वाली भाषा में बदल सकता है (binary, मतलब की  0 और 1, या फिर hexadecimal, मतलब 16 character, 0123456789ABCDEF) |

अगर आप ये सोच रहे है की “context-free” होता क्या है, तो ऐसे समझ लीजिये की इसे समझने के लिए common sense की जरुरत नहीं होती | इंसानों के पास common sense होता है, मशीनों के पास नहीं, जैसे की “मेरी मर्ज़ी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता” का शाब्दिक अर्थ अलग होगा और असली मतलब कुछ और है | ज्यादातर भाषाओँ में अगर आपको सन्दर्भ पता है तो शब्दों का मतलब अलग होता है, संस्कृत में ऐसा नहीं होता | संस्कृत में कौन सा शब्द आगे था और कौन सा पीछे इस से भी फ़र्क नहीं पड़ेगा, बिलकुल batch program की तरह, अब जरा आप “Rama killed Ravana" और फिर "Ravana killed Rama" में शब्दों के आगे पीछे हो जाने से मतलब में हो जाने वाला फ़र्क देख लीजिये |

कला और विज्ञान विषयों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए इस मामले में | जहाँ विज्ञान में नियम हमेशा एक से होते हैं वहीँ कला के विषयों में इस्तेमाल होने वाले नियम बदले जा सकते हैं | Albert Einsten ने काफी कोशिश की थी लेकिन, Grand Unified Theory of Physics, नहीं बना पाए थे, 2500 साल पहले पाणिनि ने किसी भाषा के लिए ऐसा कैसे किया ये सोचना जरा आश्चर्यजनक है | 2500 साल में हम लोग इसका पूरा इस्तेमाल भी नहीं सीख पाए हैं |

संस्कृत के इतने उन्नत होने का एक और कारण है, देवनागरीलिपि का योजनाबद्ध होना | एक समूह के अक्षर ऐसे अलग अलग स्वर दें ऐसी कोई और लिपि नहीं है, फिर कौन से दांतों से जीभ को छूने से बोले जायेंगे, कौन से तालू को वो भी अलग अलग किये हुए हैं | ज्यादातर शिक्षक शायद आज सिखाते नहीं इसलिए अगर इसका पता नहो तो “स” का उच्चारण देखिये, इसे “दन्त स” कहा जाता है, अपनी जीभ को दांतों से सटाये बिना आप इसका उच्चारण नहीं कर सकते | एक दूसरा वाला “श” होता है जिसे “तालव्य श” कहते हैं, तालू से जीभ को छुए बिना इसका उच्चारण नहीं होगा | तीसरा “ष” कहलाता है “मूर्धंत ष” और इसके उच्चारण के लिए अपने जीभ के अगले भाग को मोड़ना पड़ता है,इसलिए नाम मूर्ध मतलब मुड़ा हुआ और अंत मतलब जीभ का अंतिम भाग |

Mendeleev इस अक्षर के लिखे जाने के तरीक़े से काफी प्रभावित थे |अपना Periodic Table उन्होंने इसके आधार पर बनाया था | जो तत्व उनके समय में ढूंढें नहीं गए थे, उनकी जगह खाली छोड़कर उनकी जगह पर उन्होंने eka (boron), dvi (silicon) और tria (carbon) जैसे संस्कृत गिनती के शब्दों का इस्तेमाल किया था |अगर किसी ने राजीव मल्होत्रा की किताबें पढ़ी हों तो वो भारतीय पद्दति का बिना कोई आभार व्यक्त किये “digestion” किस पद्दति को कहते हैं ये समझ में आ गया होगा |

इसराइल ने जब हिब्रू भाषा को फिर से जागृत कर दिया जब की वो एक काफी कठिन भाषा समझी जाती है, तो फिर संस्कृत के लिए ये छुआ छूत क्यों फैलाया जा रहा है, ये समझ में नहीं आता | आप पे थोपी नहीं जा रही ये भाषा, सिर्फ जिसे जबरदस्ती हटा दिया गया था उसे वापिस लाया गया है |
(22 November, 2014)

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