हर साल जो बदलता ऐसा तो सिर्फ़ कैलेंडर होता हैं ना सरकार

साड़ी के प्लेट सही करना अच्छी खासी मेहनत का काम है शायद, काफ़ी वक़्त लगता है पहनने वाले के हिसाब से बिलकुल सही प्लेट बनने में | उसके बाद फिर सारे एक्सेसरीज मैच करने की अलग क़वायद होती है | अक्सर ऐसे वक्त में हमारी निगाह घड़ी पे ही होती है, मगर जब कोई तैयार हो कर आ जाए तो मुस्कान अपने आप ही चेहरे पे तैर जाती है |
“हां, पता है की अच्छी लग रही हूँ, लेकिन थोड़े साल में मैं बुड्ढी हो जाउंगी, खूबसूरत नहीं लगूंगी और फिर तुम मुझे प्यार नहीं करोगे !!”, अब इस अचानक के हमले की हमें उम्मीद तोकतई नहीं थी, लेकिन अब दो साल में थोड़ी प्रैक्टिस हो जाती है | देर भी हो रही थी तो सबसे आसान वाला तरीका भी इस्तेमाल कर लिया, कहा कुछ भी नहीं और धीमे से “I Love You” कहने के अंदाज में होंठ हिला दिए बस | इसपे हल्की से मुस्कान, सरकार के चेहरे पे वापिस तो आई मगर तसल्ली उन्हें फिर भी नहीं हुई थी, “ये तो तुम रोज़ ही कह के बहला लेते हो, मैं कई साल बाद की बात कर रही हूँ, तब भी कहोगे क्या ?”
“लेकिन हम लोगों को देर हो रही है न, और फिर ठण्ड का मौसम है, शायद लौटने तक कोहरा भी आने लगे !”, मुस्कुराते हुए, शेष ने सवाल से फिर से बचने की कोशिश की | पीछा मगर इतनी आसानी से नहीं छूटना था, इति ने फिर दोहराया, “लेकिन मुझे जवाब तो दिया नहीं, जब बूढी हो जाउंगी, झुर्रियां होंगी, तब प्यार करोगे क्या ?” आईना कमरे में ही था शेष वहां ले आया, कंधे पर सर टीका कर पुछा “इति, अब देखो जरा आईने में, क्या दिखता है ?” अब जरा अच्छी वाली मुस्कान वापिस आ चली थी, “हम दोनों नजर आ रहे हैं, मैं हमेशा की तरह खूबसूरत लग रही हूँ, मगर तुम बुड्ढे हो रहे हो, देखो तो बाल भी उड़ते जा रहे हैं ! दो चार सफ़ेद बाल भी नज़र आ रहे हैं, डाई लगी नहीं इस बार अच्छे से |”
“नहीं, ऐसे नहीं, थोड़ा और ध्यान से बस आँखों में देखो |” कहते हुए शेष, इति को आईने के और पास ले आया, “अब यहाँ से सिर्फ़ गौर से आँखों में देखना, ये जो चमक नजर आती है न, तुम्हारे साथ होने पर, ये हमेशा ऐसी ही दिखेगी जब हम खुश होंगे | और साथ होंगे तो खुश भी होंगे |” वैसे तो खुश होने लायक बात थी, लेकिन ज्यादा खुश होने पे भी लड़कियां रोने क्यों लगती हैं ये आज भी समझ नहीं आया ! ऊपर से नए सवाल आने अभी बंद कहाँ हुए थे, “तुम्हें पता था की इस जवाब पे मैं मान जाऊंगी ?”
शेष अब भी मुस्कुरा रहा था, “वो इसलिए पता था क्योंकि तुम प्यार मेरे लिए एहसास कम और ज़िम्मेदारी ज्यादा है | तुमसे मिलने के दिन से हर रोज हम इस आईने में खुद को जांच लेते हैं | पहले दिन से ज्यादा नहीं तो कम से कम पहले दिन जितना ही प्यार तो आँखों में दिखना ही चाहिए ! फिर तसल्ली हो जाती है की कोई बेईमानी नहीं की तुमसे ! अब चलें, वरना देर हो जाएगी !”
हर साल जो बदलता ऐसा तो सिर्फ़ कैलेंडर होता हैं ना सरकार... हम तो वही हैं लगभग दो साल पुराने वाले.. चलें फिर नए साल में....
(31 December, 2014)

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