कूएँ के मेंढक का बड़ा पुराना किस्सा है | अभी भी कम जानने वाले को कूप मंडूक कहते हैं लोग | किस्सा नहीं सुना ? हम फिर से सुना देते हैं |
हुआ यूँ की बाढ़ की स्थिति थी, नदियों में पानी लबा-लब !! तो एक बेचारा नदी का मेंढक बह के गाँव में आ गया ! गाँव में कूआं था, सो बहता मेंढक चप्प से कूएँ में जा गिरा | कूएँ में पहले से एक बुड्ढा मेंढक था | उसने कहा तू कौन बे ? यहाँ कहाँ टपक पड़ा ? तेरी इतनी औकात की मेरे भरे पूरे कूएँ में अपने चप्पू जैसे पांव टिकाये ! निकल बाहर !
नदी से आया है तू पहले ये बता नदी होती कैसी है ? बुड्ढे मेंढक ने पुछा | नए मेंढक ने फ़ौरन बताया, चच्चा बड़ी सी होती है | सुनते ही बुढा मेंढक आधे कूएँ की छलांग मार के आया पुछा इतनी बड़ी ? न न !! नए मेंढक ने बताया, इस से भी बड़ी ! बुढा मेंढक इस बार कूएँ के एक कोने से दुसरे तक कूद गया | पुछा इतनी बड़ी होती है क्या ? ना दद्दा इस से भी बड़ी होती है नदी !
बुढा मेंढक हंस पड़ा ! अबे चल हमें बनता है, हमने दुनियाँ देखी है तुझसे कई गुना उम्र है हमारी, कूएँ से बड़ा कुछ नहीं होता | चल हांकना बंद कर और पड़ा रह यहीं कहीं कोने में |
तो साहब कूप मंडूक के लिए कूएँ से बड़ी कोई नदी कोई समंदर नहीं होता |
इसे समझना हो और कहीं आप दिल्ली में रहते हों तो एक बार अपने मकान मालिक से पूछियेगा की कहाँ कहाँ घूम आया है भारत में | वैष्णो देवी, कटरा तक का रास्ता बता देगा | फिर थोड़ा और उकसा लीजियेगा, अबे ग़रीब इलाकों में नहीं जाते हम | फिर दूसरी साइड का बताइयेगा तो आप सुनेंगे वहां मद्रासी रहते हैं | फिर तीसरी साइड का पूछियेगा | पता चलेगा उधर ट्रेन नहीं जाती |
खैर कूप मंडूक का किस्सा और चुनाव का माहौल ! चलिए देश की भावी राजनीति पर उनके व्याख्यान सुनिए | "आप" ने उनसे ज्यादा दुनियाँ थोड़ी न देखी है |
कूएँ से बड़ा कुछ नहीं होता | टर्र टर्र
(February 7, 2015)