“इतने गौर से क्या देख रहे हो लगातार ?” मॉल की रेलिंग के ज्यादा नज़दीक शेष को खड़ा देखते ही ईति को फ़िक्र होने लगती थी शायद | “कुछ ख़ास नहीं, बस नीचे की हलचल !”, इतने में ईति की निगाह नीले टॉप पर पड़ चुकी थी, “सुधार जाओ, शादीशुदा हो अब ! जरूर उस लड़की को घूर रहे थे तुम ! अब तक उसे समझ आ गया होगा की तुम खा जाने वाली नज़रों से उसे घूर रहे थे, लुच्चा लफंगा से शुरू होने वाली सारी गालियाँ दे चुकी होगी अब तक तुम्हें, मन ही मन !”, ईति अब कोसने वाली नज़रों से शेष को घूर रही थी |
"झूठ मत बोलो, कहीं जो आँखों से देखने के अलावा खाया भी जा सकता तो वजन आधा हो गया होता बेचारी का !"
पीछे कहीं से “चिट्टियाँ कलाइयाँ वे..” बजने की आवाज़ आ रही थी | “तुम्हें ये गाना पसंद है ? मैंने आज ही ऑफिस जाते वक्त सुना है |”, ईति ने ना में सर हिलाते हुए जवाब दिया “इस लड़की को शौपिंग करने की कोई समझ ही नहीं, भला झुमके और शॉर्ट्स की शौपिंग के लिए लड़के को क्यों ले जाना चाहती है ? चुनने में कितनी दिक्कत होगी, लड़के को जल्दी होगी और लड़की को चार दुकानें और देखनी होंगी !”, “पसंद तो मुझे भी नहीं, लेकिन मुझे इसलिए नहीं पसंद क्योंकि ये लड़की लगातार कुछ न कुछ मांगती ही रहती है | कितनी चीज़ें चाहिए इसे ? एक Kick न चाहिए ? लालची कहीं की !”, “लड़की को kick !! घनघोर नारी विरोधी, मैं तुम्हारी महिला आयोग में शिकायत करुँगी, वैसे इस गाने में लड़की kick वाली ही है |”
“मगर सुनने में अच्छा लगता है ये गाना”, दोनों लगभग एक साथ बोल पड़े | “मगर तुम ऑफिस जाते वक्त रेडियो पर सुनना ये गाना | टीवी पर तुम उस Kick वाली लड़की को घूरोगे ! फाइनल”, ईति का फाइनल फैसला आ गया | “ओह, come on ! इतने लफंगे भी नहीं हम !”
“चलो चलो, सब पता है, नजर कहाँ होती है !”
(February 7, 2015)