तुम यहाँ कैसे ?

“भाई छोटी गोल्ड फ्लेक देना, पांच”, अभी बचे हुए दस रुपये पचास के नोट में से उठाने ही जा रहे थे की पीछे किसी लाल पीले रंग सा महसूस हुआ | शायद साड़ी है किसी की, सिक्के जीन्स में डालते हुए हमने सोचा | डब्बा जेब में डालते मुड़े ही थे की मुस्कुराता सा चेहरा सामने था | “सुधरे नहीं अभी तक ? बरसों पहले छोड़ दी थी न ?”, अचानक के इस सवाल की तैयारी तो बिलकुल नहीं थी | छोटा सा क़स्बा, यहाँ तो कोई जान पहचान का मिल जाये सोचा ही नहीं था ! झिझकते हुए डब्बा जेब में डाला और वैसा ही झेंपता हुआ सा, “हां अभी भी कभी कभी..” कह दिया |
“तुम यहाँ कैसे ?”, अब तक हम जरा संभल चुके थे | “तुम्हारी शादी तो UP में कहीं हुई थी न ?”, यहाँ ऐसे मुलाकात हो जाने की उम्मीद बिलकुल भी नहीं थी | “हां अब यहीं रहते हैं हम”, कहते कहते दुकान वाले से वो प्याज और मैदे के लिए पूछने लगी | रुकें या जाएँ, बिना कुछ कहे जाना भी अजीब सा लग रहा था, और रुकने कहा नहीं तो आगे क्या बात की जाये ये भी नहीं सूझ रहा था |
फिर भी रुक गए, “ग्रेजुएशन के आगे पढाई नहीं की ? तुम्हारा तो नंबर अच्छा होता था न ?”, मुड़ने पर हमने फिर पुछा | “नहीं, फ़ुर्सत ही नहीं हुई शादी के बाद, अब तो इतने साल हो गए |” “और बच्चे, स्कूल में होंगे अब तो ?” थोड़ा अटकता हुआ सा जवाब आया, “नहीं, अभी बच्चे हैं नहीं | मैं घर चलूँ, वरना खाना बनाते देर हो जाएगी |” कुछ ख़ास बचा नहीं था बात करने के लिए, फिर दूकान वाला भी बीच बीच में नजर बचा के देख लेता था | जिस से घंटों बात होती थी उस से कहने को कुछ बचा नहीं था, “हां ठीक है, फिर मिलेंगे” |
जाते ही हमने दुकान वाले से माचिस मांगी | “इन्हें पहले से जानते हैं क्या ?” दूकान वाले ने पुछा, “हां” हमने कहा, “काफी साल पहले एक ही क्लास में पढ़े थे हम लोग” | दूकानदार ने हामी में सर हिलाया, “अकेले ही रहती है, भली सी है बेचारी, पति सिर्फ़ पैसे भेज देता है |” हमें ये अंदाजा नहीं था, हमने भी हामी में सर हिला दिया |
इतने साल बाद कहने को शायद ही कुछ बचा होता है, वैसे तो कहने सुनने लायक सात – आठ साल थे बीच के | शायद इतना लम्बा वक्त बीच में ज्यादा ही जगह बना देता है |

(January 12, 2015)

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