ह सूरज का उगना देखता रहा | फिर खानकी घाटी की तरफ नज़र दौड़ाई | सितम्बर की शुरुआत से ही अफगानों की हलचल दिखाई देती थी | कुल इक्कीस जवान सिक्ख तैनात थे सारागढ़ी में उनपर नज़र रखने के लिए | इशर ने दूरबीन से झाँका, रोज जैसी चहल पहल, घोड़े सज रहे थे, सलवार सँभालते पठान जीन कसते हुए |
सब रोज़ जैसा ही |
“बोले सो निहाल...”, इशर कंगूरे से दहाड़ा !! “सत् श्री अकाल !!” जवाब में पूरी घाटी गूंज गई ! एक दुसरे को ऐसी चुनौती सिपाहियों के लिए रोज़ का मज़ाक था | नीचे से बूटा चिल्लाया, उतर आओ पाजी, कोई पठान गोली न दाग दे !! मुस्कुराता सूबेदार नीचे उतर आया | ओये साहेब, ओ हिर्या कोई इंतज़ाम लगा रोटी शोटी दा ? सिपाही भूखा नहीं लड़ता ओये ! जल्दी हाथ चला ले |
गुरमुख बन्दूक साफ़ कर रहाथा, उत्तर और राम सिंह तलवारें सान रहे थे | ओये शाबाश जट्ट ओये, हवालदार फिर खिल खिलाया | दुश्मन कई दिन से तैयारी करता नजर आता था | जवाब में सिक्ख थे |
सुबह का कलेवा बना, समझ अब तक सबको आ गया था, आज इस पार या उस पार | इक्कीस थे किले में, रोज़ की तरह सरदार इशर ने फिर पुछा, “कोई घर लौटेगा ?”, लांस नायक चंदा मुस्काया, मूछें मरोड़ते हुए पुछा वापिस में सवाल, “प्रा जी हम तो यहीं निपटेंगे, ले के कौन जाएगा ?” जोरदार ठहाके से किले की दीवारें फिर हिल गई | बोले सो निहाल... सत् श्री अकाल !!
नाश्ता करते करते में इशर सिंह ने कंगूरे पे निगाह लगाईं | दोनों के दोनों भगवान् सिंह बंदूकें भरते थे, “क्या हुआ ओये ?” रोटी हाथ में ही थम गई, “घोड़े इधर ही आते दिखते हैं हुज़ूर ! सरकार बहादुर को इशारा दिया जाये |” इशर ने दाल की कटोरी साफ़ की, “आण दे ओये, सवा लख ते एक लडावां...”
तिराह की मुहीम में बारह सितम्बर सन अट्ठारह सौ संतान्बे को को 36 th सिख (अब सिख रेजिमेंट की चौथी बटालियन) के इक्कीस सिपाहियों ने सरागढ़ी की ये जंग लड़ी थी | आज इसे खायबर – पख्तुन्वा कहते हैं,पकिस्तान का हिस्सा है | एक तरफ थे इक्कीस सिक्ख और दूसरी तरफ दस हज़ार अफगान लड़ाके ! चिड़ियाँ नाल जे बाज लड़ावां ....
चुके थे दाल समेटते हुए | युद्ध के इतिहासकार इसे सिक्खों का सबसे बड़ा मुकाबला मानते हैं | सिख चाहे फ़ौजी हो या न हो, 12 सितम्बर को सारागढ़ी दिवस मनाता है | कोहट के समाना में बीस अप्रैल 1894 को कर्नल जे. कुक के मह्तात 36वीं सिख रेजिमेंट की पांच कंपनी दी गई |लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन हौघटों को ख्यबर भेजा गया था | उनके सामने थे समाना पहाड़ी,कुरग, संगर, सह्तोप धर और सारागढ़ी |
पश्तून समय समय पर हमले करते थे | ब्रिटिश सेनानायकों ने लेकिन कमान थामे रखी | हिन्दू कुश की पहाड़ियों पर लोकखार्ट का किला और गुलिस्तान का किला सर उठाये खड़ा रहा | एक दुसरे को दिखने के कारण ये किले बड़े फायदेमंद थे, बीच में सारागढ़ी का किला बना दिया गया था | हेइलोग्रफिक यानि की आईने के इशारों से इनके बीच संवाद चलता था |
सरागढ़ी दरअसल एक टूटे कंगूरे पर बना ब्लाक हाउस था किला नहीं | सिक्ख किला कहते थे इसे, signal देने के लिए इसमें एक कंगूरे पर ऊँचा सा टावर था | पश्तूनों ने 27 अगस्त से 11 सितम्बर 1987 के बीच इसे हड़प लेनेकी जोरदार कोशिशें की | 36वीं सिख रेजिमेंट के जवानों ने उन्हें धूल चटा दी | ऐसे ही हरी सिंह नलवा ने पश्तूनों को सलवार नहीं पहना दी थी, उनके वंशज भी वैसे ही तगड़े थे !
गुलिस्तान के किले पर तीन और नौ सितम्बर को अफरीदी कबीलों ने हमला किया, दोनों बार हमले नाकाम हुए | लोकखार्ट से रसद आई,और लौटते वक्त सरागढ़ी पर वो लोग सिखों को छोड़ गए | एक सरदार, और बीस और सरदार सरागढ़ी को किला बना गए | दोनों किलों के बीच का सम्बन्ध तोड़ने के लिए बारह सितम्बर, 1897 को दस हज़ार पश्तून इक्कीस सिक्खों पर टूट पड़े !
सरदार गुरमुख सिंह लगातार हेइलोग्राफ से फोर्ट लोकखार्ट तो संदेशा भेजते रहे थे | यही वजह है की इस युद्ध के सारे तथ्य मौजूद हैं | करीब नौ बजे लगभग दस हज़ार अफ़गान सरागढ़ी पर टूट पड़े | सरदार गुरमुख सिंह ने कर्नल Haughton को संदेशा भेजा, लेकिन Haughton ने मदद भेजने में अपनी असमर्थता बताई | हवालदार सरदार इशर सिंह ने तय किया, सारे सिख आखिर तक लड़ेंगे| सबसे पहले घायल हुए सरदार भगवान् सिंह, फिर सरदार लाल सिंह, भगवान् सिंह सबसे पहले वीरगति को प्राप्त हुए | सिपाही लाल सिंह और जीवा सिंह सरदार भगवान् सिंह के पार्थिव शरीर को ले कर अन्दर आये | शत्रु दिवार का एक कोना तोड़ गया | कर्नल Haughton को करीब दस से चौदह हज़ार पश्तून सरागढ़ी पर हमला करते नज़र आये | अफगानफौजों के नेता ने सिखों को आत्मसमर्पण को कहा | दरवाज़ा तोड़ने की नाकाम कोशिश हुई |दिवार आखिर टूट गई | सम्मुख युद्ध हुआ | सरदार इशर सिंह आगे आये | बाकि साथियों को अन्दर की ओर डाल के अकेले अफ़गानी मुस्लिमों पर टूट पड़े | सभी साथियों के मरने तक सरदार गुरुमुख सिंह जिन्दा थे | एक कंगूरे पर चढ़े हुए वो शत्रु से लोहा लेते रहे,आखिर कोई चारा न देख के सबने वहां आग लगा दी |
“बोले सो निहाल... सत् श्री अकाल के नारे के साथ सरदार गुरुमुख सिंह वीरगति को प्राप्त हुए |
(February 5, 2015)