बहुत पहले एक बिल्डर ने कौशाम्बी (दिल्ली) में एक स्टूडियो अपार्टमेंट बनवाना शुरू किया था | भारत के लिए सिर्फ एक कमरे का अपार्टमेंट थोड़ा नया concept था | तो लोगों को समझाने के लिए उन्होंने अख़बारों में जो पूरे पन्ने का प्रचार निकाला उसमे वो लिखते थे की दिल्ली में हर रोज़ बाहर से करीब साढ़े छः लाख लोग आते हैं | ज्यादातर तो एक दो दिन के काम या घूमने आये होते हैं लेकिन करीब ढाई लाख लोग दिल्ली में काम ढूँढने और वहीँ बस जाने के इरादे से आये हुए होते हैं | इनमे से ज्यादातर की आर्थिक क्षमता बहुत ज्यादा नहीं होती और रहते भी अकेले हैं इसलिए स्टूडियो अपार्टमेंट यानि एक कमरे का घर |
अब सवाल है की इतने लोग आ कहाँ से जाते हैं ? ज्यादातर उन इलाकों से आते हैं जिन्हें आप BIMARU राज्य कहते हैं, कभी कभी buffallo belt भी | इनके घर समाजवादी टाइप की सरकार है, जो हर चीज़ मुफ्त में देने का वायदा करती है | चरवाहा विद्यालय बिहार का शायद याद न हो, लेकिन NAREGA भी राजद के ही एक नेता की देन थी | मुफ्त लैपटॉप देने वाली योजना भी याद होगी |
इस मुफ्त के चक्कर में एक छोटा सा नुकसान हो जाता है | लोग काम करना बंद कर देते हैं, अब कामगार नहीं होंगे या हड़ताल पर होंगे तो उद्योग धंधे चौपट, ऊपर से खाली दिमाग शैतान का घर होता है तो रोज़ नयी रैली, नया हंगामा | आप लोगों में से बहुत कम ने रैली से लौटती हुई भीड़ देखी होगी | पूरे शहर को ठप्प कर देती है, खुली हुई दुकानें लूट ली जाएँगी, गाड़ियों के शीशे तोड़े जायेंगे | लड़कियां उस दिन स्कूल कॉलेज नहीं जाती, सब लोग ही बाहर निकलने से परहेज़ करते हैं |
अब दिल्ली में ऐसी ही एक पार्टी सरकार बनाने पर तुली हुई है | इन्हें समर्थन कैसे लोगों का मिल रहा है वो भी नज़र आ ही रहा होगा | छोटे मोटे व्यापारी से ले कर घरों तक चंदा मांगने पहुंचे ही होंगे सब, तो अब आपको ये भी पता है की चंदा माँगा नहीं जाता | चंदा वसूला जाता है !
सड़कों पर जाम ऐसे भी रोज़ की बात है दिल्ली के लिए तो दस बजे ऑफिस पहुँचने के लिए पहले जहाँ साढ़े आठ में आप बाइक start करते थे अब और आधे घंटे पहले निकलते होंगे घर से | राजनैतिक सभाओं और रैलियों में कैसे लोग आते हैं और उनसे तर्क करने का क्या नतीजा होता है ये भी कई लोगों को पता चल ही गया होगा | मतलब जानने के लिए ज्यादा कुछ बचा नहीं |
फिर भी एक बार बिहार, उत्तर प्रदेश या बंगाल का चक्कर लगाने की सलाह तो हम जरूर देंगे | पता है माइग्रेशन इन जगहों से दिल्ली की तरफ होता है, कोई टूरिस्ट भी इधर घूमने नहीं आता है परंपरागत टूरिस्ट डेस्टिनेशन नहीं है ये जगहें | लेकिन समाजवादी कही कही जाने वाली मुफ्तखोर व्यवस्था इलाके का कैसा नुकसान करती है ये देख कर पता चल जायेगा | दिल्ली से ऐसे भी उद्योग गाज़ियाबाद, नॉयडा, गुडगाँव की तरफ खिसक रहे हैं |
और गरीबी के बाद अगर मुफलिसी बुलानी हो घर पे तो चुनाव नजदीक ही हैं... चुनिए...
(February 3, 2015)