बस यही तकनीक इस्तेमाल होती है वोटिंग में | अगर सुबह सुबह वोटिंग धीमी करवा दी गई तो दहाड़ी मज़दूर, सब्जी के ठेले वाला, खोमचे वाला, पानीपूरी वाला, फेरी वाला सोचेगा साहब सुबह से तो कुछ कमाया नहीं ! शाम यहीं ढल गई तो परिवार को क्या खिलाऊंगा ? बच्चों का क्या ? बीवी ताने देगी वो अलग ! तो साहब वो लाइन से निकल के अपना ठेला लेगा और काम पर निकल जाएगा | सुबह से शाम तक जो कमाया वही खाना है बेचारे ग़रीब को !
ओह लग रहा है की कितने लोग होंगे ऐसे ? साहब ऐसे लोगों की आबादी करीब बारह प्रतिशत है दिल्ली में | इसमें से वोट कौन देगा ? जो भी अगला त्यौहार हो उसकी छुट्टी में देख लीजियेगा, आप ओवरटाइम कर लेंगे लेकिन ये ग़रीब परिवार के साथ होगा | पूरी बस्ती इसकी पोल्लिंग बूथ पे थी | देर हुई सब लौट गए | अब ये देर कैसे हो गई और क्यों हो गई ?
चोरी के बाद मौका ए वारदात से सबसे पहले कौन भागता है ? चोर भागता है न ? जरा बूथ पर देख आइये कौन सी पार्टी के एजेंट गायब हैं ?
जब कहा था की दिल्ली वालों आपने चुनाव नहीं देखा तो हंसी आई थी हमपे क्या ?? अब खुल के हंस लीजिये ...
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अच्छा सामंत से क्या समझते हैं आप ? कभी देखा है क्या होता है सामंत ? नहीं ? ओह आप तो गाँव में कभी गए ही नहीं साहेब आप तो दिल्ली में रहते है ! ठीक है न दिल्ली में ही हैं न ? चलिए साथी आपको सामंतवाद सिखाएं | तो जैसे आप घर जाएँ और किसी बात पर अपने पिताजी से लड़ कर (शायद आप उन्हें पापा या daady कहते हों) फिर कहते हैं खाना नहीं खाऊंगा सोने जा रहा हूँ ! होता क्या है इसके बाद ? आपकी माँ आ कर आधी रात तक आपको मनाती है फिर खाना खिला के जाती है |
शौक बड़े अजीब से होते थे इन सामंतों के, कबई नाम की मछली जरूर नदियों से निकलवाते थे | ब्राम्हण कबई शायद ही कभी खाता होगा, पोठी, चेंगड़ा तो बिलकुल नहीं | किसके लिए पकड़वाई जाती थी ये मच्छी ?? अपने अम्बेद्कर्वादियों से पूछो |
अब दिल्ली चुनाव के टाइम ऐसे किस्से क्यों सुना रहे हम ? तो भाई बूथ कैप्चर करने का दूसरा आसान तरीका नहीं बताया था न इसलिए सुना रहे हैं | जिसे रात में रोटी भिजवाई थी वो बच्चा अब बड़ा हो गया है | करीब 40-45 साल का और सरकारी नौकरी भी है उसकी | तो मजिस्ट्रेट ड्यूटी में वो किसी पोल्लिंग बूथ पर है |
आप पूछेंगे कौन सी बूथ पर है ? तो साहब गुप्ता जी वहां हैं जहाँ कोई गुप्ता चुनाव लड़ रहा है, मिश्रा जी का प्रमोशन नहीं हुआ तो वो वहां असिस्टेंट है | आफ्सीन साहब कहीं बल्लीमारान में होंगे मुस्लिम सीट का चुनाव देखते हुए | इनकी पोस्टिंग कौन करता है ?
ओह ये भी नहीं पता !! हद है दिल्ली वालों, ये पोस्टिंग राज्य सरकार के अनुशंषा से होती है | मतलब किसने किसे कहाँ बिठाया है वो तो पता चल ही गया होगा | अभी भी यकीन नहीं है तो एक बार अपने पोल्लिंग बूथ के अधिकारीयों का नाम पता कीजिये |
नाम पता चल जाए तो फिर जाती पता कीजिये, फिर देखिये उस इलाके के उम्मीदवारों की जाती | खाप पंचायतों का फैसला बिना सुने सुनाई दिया ??
दूसरा तरीका है बूथ कैप्चर करने का !!
कहा था न दिल्ली वालों ने अभी तक चुनाव नहीं देखा ... मज़े लीजिये...
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दिल्ली होने या दिल्ली के पास होने का सबसे बड़ा फायदा ये है की आप मीडिया (Main Stream Media) की नज़र में आसानी से आ जाते हैं | अभी दिल्ली में चुनाव हुए हैं, सबने अपना अपना चुनावी विश्लेषण दिया | किसी तरह से किसी राज्य के चुनाव को इतना coverage नहीं मिलता | Social science के छात्रों के लिए इस से अच्छा अवसर नहीं होगा | कितनी भी किताबें चाट लें आप अगर किसी चुनाव में किसी पोलिटिकल पार्टी के समर्थन में दस रोज़ भी वालंटियर कर दें तो आप भारत के बारे में ज्यादा सीख जायेंगे | इसे सीखने के लिए आपका पढाई में बहुत तेज़ होना भी जरूरी नहीं | जैसे आपने मारवाड़ियों को देखा होगा, बहुत ज्यादा पढ़े लिखे नहीं होते लेकिन थोड़ा सा कॉमन सेंस और बचपन से हर रोज़ थोड़ी देर दूकान पर बैठने की आदत से वो धंधा चलाना सीख जाते हैं | बस वैसे ही एक नज़र डालिये दिल्ली चुनाव पर, इस बार दिल्ली ने अच्छा वाला चुनाव देखा है, ऐसा मौका नहीं चूकना चाहिए |
जब भारत में चुनाव की बात होती है तो फ़ौरन Caste (जाति) की बात होने लगती है | कौन से जात का candidate खड़ा किया जाए जिसके जीतने की संभावना सबसे ज्यादा हो ये देखा जाने लगता है | लेकिन असली चीज़ जो देखी जा रही होती है वो है Social Dominance, ये सिर्फ जाती नहीं होती | जातिवादी समीकरणों से थोड़ी सी टेढ़ी चीज़ होती है | इसके लिए दिल्ली के पास का शहर मेरठ देखिये | ये करीब 35 लाख की आबादी वाला शहर है | करीब 62% हिन्दू हैं, करीब 35% मुस्लिम, 3% सिख और आधा आधा परसेंट के लगभग जैन और इसाई आबादी है यहाँ | उत्तर प्रदेश के हिसाब से यहाँ की साक्षरता दर जरा ज्यादा है करीब 75% | अब यहाँ साक्षरता ज्यादा है, हिन्दू आबादी भी काफ़ी है, तो क्या कोई पढ़ा लिखा हिन्दू युवक ठीक होगा चुनाव जीतने के लिए ? नहीं, हिन्दू एक मुश्त मतदान नहीं करते, इसलिए जाति, इलाके, के नाम पर बंट जायेंगे |
इस इलाके को जाट प्रभुत्व वाला इलाका माना जाता है | Jatland कहे जाने वाले इस इलाके में जाटों की आबादी कितनी है ? करीब 10%, अब 10% पर कोई चुनाव कैसे जीत सकता है ? नहीं जीत सकता | लेकिन अगर जाट और मुस्लिम को आप एक साथ खड़ा कर दें, तो करीब 45% मत आपके हाथ आने की प्रबल संभावना है | सवाल है ये किया कैसे जाए ? तो एक कम्युनिटी है चच्चर कई साल पहले ये जाट हुआ करते थे लेकिन अब ये धर्म परिवर्तन कर के मुस्लिम हो गए हैं, यानि की मुस्लिम जाट !
इस इलाके की करीब 70% आबादी गन्ने की खेती से किसी न किसी तरह जुड़ी है | तो अगर उम्मीदवार गन्ने की खेती करता है तो सोने पर सुहागा | अब जो बाकि के उम्मीदवार बचते हैं उनके पास होगा कुल 55% मत | अगर इनका दूसरा झुकाव खड़ा कर दिया जाए तभी कोई challenge आएगा, वरना मुस्लिम जाट जीतेगा |
बसपा यहाँ से हाजी शाहिद इखलाक को खड़ा करती है |
अब इस समीकरण को तोड़ा कैसे जाए ? तो जातिगत समीकरण को तोड़ने के लिए हिन्दू मुस्लिम की धार्मिक भावनाओं को उकसाने की जरूरत पड़ती है इसके लिए | लगातार प्रचार करने के लिए उसकी आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ होनी चाहिए | तीसरा उसका किसी जातिविशेष पर झुकाव नहीं होना चाहिए | ये कैसे किया जाये ?
तो शुरू शुरू में हमने मारवाड़ी / बनियों के धंधा सीखने की बात की थी | बनिए की सबसे दोस्ती होती है, किसी से बैर नहीं | आर्थिक स्थिति भी अक्सर अच्छी मिल जाएगी | गन्ने के, चीनी के व्यापार के लिए उनका सबसे मिलना जुलना होता है, इसलिए जातिगत वैमनस्य का इल्ज़ाम भी उनपर नहीं थोप सकते हैं | राजपूतों पर सामंती मानसिकता, और ब्राम्हणों पर जातिवादी भेदभाव भड़काने का इल्ज़ाम मढ़ा जा सकता है |
तो बीजेपी यहाँ से अपना उम्मीदवार बनाती है श्री राजेंद्र अग्रवाल को | पिछले दो बार से जीत भी रहे हैं अपने निकटतम प्रतिद्वंदी इखलाक साहब से |
चलिए अब दिल्ली में अपने इलाके के social dominance पर ध्यान दीजिये एक बार | बिना गोला बारूद के बूथ कैप्चर का तीसरा तरीका है ये |