पुराने ज़माने में विज्ञान पढाया जाता था | आज कल शायद वो सब नहीं पढ़ाते, पता नहीं किताबें कौन लिखता है ! पानी साफ़ करने के तरीके भी सिखा देते थे | फिर सारे कम्युनिस्ट किताबें लिखने लगे | अचानक से या धीरे धीरे पानी साफ़ करने के तरीके किताबों से गायब होने लगे |
बिसलेरी कहीं शुरू हुई, कहीं किंगफ़िशर आई ! ये कंपनियां साफ़ पानी मुहैया कराने लगी | जी बिलकुल सही कहा, कीमत चुकानी पड़ती थी पानी की, “ठाकुर का कुवां” कहाँ था जो मुफ्त पानी आता ? अजीब से कंपनी है, ब्रिटेन से टीपू सुलतान की तलवार ख़रीद लाते हैं मालिक, लेकिन इसके मजदूरों को तनख्वाह नहीं मिलती | खैर जब कोई लाल झंडा नहीं दिखा विरोध में तो हम कौन है सवाल करने वाले ? पूरी वर्दी ही लाल होती थी | शायद ज़माना दूसरा था |
चलिए वापिस वो पानी साफ़ करने का विज्ञान की किताबों वाला तरीका देखते हैं | इसमें एक के ऊपर एक घड़ा रखते थे | घड़ों में वैसा ही एक छेद होता था, जैसा आपने शिवलिंग के ऊपर टंगे होते हैं और उनसे बूँद बूँद पानी टपकता होता है | सबसे ऊपर वाले घड़े में होता था पानी, उस से बूँद बूँद बह कर पानी जाता था उसके नीचे वाले घड़े में | इस दुसरे घड़े में होता था चारकोल, या कोयला समझ लीजिये, फिर इस से बह कर पानी तीसरे घड़े में जाता था | इस तीसरे घड़े में बालू होता था, और इसके नीचे कपड़ा बंधा होता था |
इस कपड़े से छन कर जब पानी आता तो वो पानी साफ़ होता था | पीने लायक | तो कपड़े से साफ़ कर के पानी ऐसे पीते थे कुछ दशक पहले तक | अब तो खैर कंपनियां हैं, पहले ही साफ़ कर के पानी देती हैं | आप ये देखिये की वो किताबें जिस से पानी साफ़ करने का तरीका गायब हो गया वो किसने लिखी थीं ? नहीं रोमिला थापर नहीं, वो तो इतिहास लिखती थी, विज्ञान कहाँ ? कोई और होंगे देखिये तो सही |
वैसे पानी से कपड़े तो आप हमेशा ही धोते आये हैं, कपड़े से पानी साफ़ करना अभी किसी “परिधान मंत्री” ने सिखा दिया न ? अजीब लग रहा होगा ?
विज्ञान शुरु में ऐसा ही अजीब लगता है |
चार साल और हैं, आदत पड़ जाएगी धीरे धीरे !
(February 21, 2015)