पुरानी लोक कथाओं में एक कहानी है ढपोर शंख की | कुछ लोगों ने सुनी होगी कुछ ने नहीं सुनी होगी, तो हम दोहरा देते हैं | हुआ यूँ की किसी गाँव में एक दरिद्र ब्राम्हण रहता था, उसका सारा समय अध्ययन और अध्यापन में ही जाता था | ऐसे में आर्थिक स्थिति तो बहुत अच्छी होगी नहीं, वो भी ग़रीब था | छोटे से गाँव में यदा कदा ही कोई आता था, लेकिन एक दिन इसके घर एक साधू पहुंचे, पुछा रात भर रुकने के लिए क्या मुझे जगह मिल सकती है ? ब्राम्हण ने कहा मेरे घर को तो आप देख ही रहे हैं ऋषिवर, आइये जो भी आतिथ्य संभव हुआ वो मैं जरूर करूँगा |
ऋषि वहीँ रुक गए, रात में भी ब्राम्हण किताबें पढता दिखा, भोजन का समय हुआ तो खाने के लिए घर में ज्यादा कुछ था नहीं | ब्राम्हण और उसकी पत्नी दोनों ने इशारों में कम भोजन करके साधू को खिलाने का फैसला किया | मगर साधू बैठे और एक शंख अपने झोले से निकाला | शंख को उन्होंने भोजन की व्यवस्था करने को कहा, देखते ही देखते कई पकवान सामने आ गए ! ब्राम्हण और उसकी पत्नी बड़े आश्चर्यचकित हुए, मगर सबने भर पेट खाया | सुबह होते ही साधू ने देखा की ब्राम्हण तो गाँव के बच्चों को पढ़ाने में जुट गया है |
थोड़ी देर में जब साधू चलने को हुआ तो उसने ब्राम्हण और उसकी पत्नी को बुलाया और कहा, मैं तो साधू हूँ, मेरी जरूरतें तो ना के बराबर हैं | तुम लोग गृहस्थ हो, सारा समय सामाजिक कार्यों में ही लगाते हो, भोजन धन आदि की व्यवस्था कर नहीं पाते | ऐसा करो ये शंख तुम रखो, इस से तुम्हारी भोजन की जरूरतें पूरी हो जाएँगी | इस तरह शंख उन्हें देकर साधू विदा हुआ | ग़रीबों की भोजन की चिंता दूर हुई तो कुछ ज्यादा प्रसन्न रहने लगे, खाना अच्छा मिलने लगा तो स्वास्थ भी सुधरा | एक दिन पड़ोसन ने आ कर ब्रम्हाणी से पुछा आज कल क्या बात है तुम लोग मोटे भी हुए जा रहे हो और खुश भी ज्यादा रहते हो ? ब्रम्हाणी ने शंख दिखाया पूरा किस्सा भी पड़ोसन को सुनाया |
अब ये पड़ोसी जरा लालची थे, तो अगले ही दिन किसी बहाने से पड़ोसी घर में आया | एक नकली शंख ब्राम्हण के घर रखा और असली वाला जादुई शंख चुरा ले गया | अगले दिन से ब्राम्हण की फिर वही दुर्दशा हो गई | कुछ दिन बाद जब साधू लौटने लगा तो उसने ब्राम्हण के घर में फिर से डेरा डाला | ब्राम्हण ब्रम्हाणी ने अपनी मूर्खता की कहानी साधू को बताई, और शंख के चोरी हो जाने का शक भी जाहिर किया | साधू ने शंख जांचा, फिर कहा की ये नकली है इसे मैं ले जाता हूँ, इसके बदले तुम ये ढपोर शंख रखो | ये और ज्यादा चमत्कारी है, इसका चमत्कार तुम्हें जल्दी ही नज़र आ जायेगा | तुम अब लोगों को बता सकते हो की साधू तुम्हें दूसरा शंख दे गए हैं, बल्कि दिखा ही देना |
अगली सुबह साधू के जाते ही प्रसन्नचित्त ब्रम्हाणी ने पड़ोसन को बताया की साधू उन्हें दूसरा शंख दे गए हैं जो पिछले वाले से भी ज्यादा चमत्कारी है | पड़ोसी पुराना शंख लेकर नए से बदलने फिर से पहुँच गया और ब्राम्हण से कहा जरा नए शंख का चमत्कार तो दिखाओ | ब्राम्हण ने शंख से कहा, हे शंख कृपया मुझे पांच स्वर्ण मुद्राएँ दे दें | शंख से फ़ौरन आवाज़ आई, अरे पांच से तो तुम्हारा पंद्रह दिन का काम ही चल पायेगा, महीने भर के लिए दस स्वर्ण मुद्राएँ ले लो ! पड़ोसी ये सुनकर भौचक्का रह गया, उसने मौका पाते ही पुराना शंख वहां रखा और नया ढपोर शंख चुरा लिया |
ब्राम्हण ब्रम्हाणी तो अपना पुराना शंख पाकर खुश हो गए और उसे अब एक सुरक्षित स्थान पर रख दिया | उधर पड़ोसी ढपोर शंख से बोला, मुझे सौ स्वर्ण मुद्राएँ दे दो, ढपोर शंख ने कहा, सौ से तुम्हारा क्या होगा ? पांच सौ क्यों नहीं मांगते ? पड़ोसी ने सोचा फिर कहा, हां हां, पांच सौ स्वर्ण मुद्राएँ दे दो ! ढपोर शंख फिर बोला, पांच सौ ! अरे माँगना ही है तो हज़ार तो मांगो कम से कम | पड़ोसी बढ़ा चढ़ा के मांगता रहा और ढपोर शंख बढ़ चढ़ के वादे करता रहा | थोड़ी देर में जब पड़ोसी की समझ में आया की ये ढपोर शंख सिर्फ वादे करता है पूरा कुछ नहीं करता तो उसने सर धुन लिया | लेकिन अब लालच पर पछताने के अलावा कुछ नहीं हो सकता था |
शहरों की दौड़ में ऐसी बच्चों को सुनाने लायक कहानियां गायब हो रही हैं | ऐसे में आपसे भी निवेदन है की कहानी को जिन्दा कहानी ही रहने दें | मिलती जुलती लगे तो भी इसे दिल्ली की तरफ न ले जाएँ |