आह क्या गाने बनते थे फिल्मों के.. आज तक बजते हैं, मन्ना डे, आशा, किशोर दा, रफ़ी साहब के गाने | एक से बढ़कर एक आवाज़ और संगीतकार तो जनाब एस. डी. बर्मन और आर. डी. बर्मन जैसे होने चाहिए | जब उनका म्यूजिक कानों में खनकता है तो आदमी का सर हिलता है | ये आज कल के लौंडों जैसा कर्कश राग़ नहीं जिसपर पैर थिरकें | ऐसे भी कहीं कोई गाने होते हैं ! धुत्त...
अरे काम काज का ही ले लीजिये आप | वो शाम का वक्त, वो तीन बजे ही सरकारी दफ्तर से घर आ जाना, वो ग्यारह बजे ऑफिस पहुँचते ही छोटू से चाय पान मांगना, वो वर्मा साहब, पाठक जी, सिन्हा जी के साथ गप्पें मरना |
वो तलाकशुदा वाली प्रोफेसर याद है, अरे कुछ प्यारा सा नाम था, बीना या मीना, अरे वही जिसका खरे साहब के साथ कुछ चल रहा था | अक्सर तो दिख ही जाया करती थी, खूब किस्से मशहूर थे उसके तो | उम्र के साथ आपकी याददाश्त भी धोखा दे रही है शायद |
इमरजेंसी वाला दौर तो याद ही होगा आपको | नेता जी से जान पहचान बढ़ाने के लिए कैसे अरेस्ट हुए थे ? भाई साहब क्या फुर्ती से दीपक को कैमरा पकडाया और जा खड़े हुए नेता जी के बगल में ! फिर पंद्रह दिन जेल क्या रह के आये थे जनाब ! सारी हिंदी साहित्यकारों की बिरादरी की जानपहचान ही इकठ्ठा कर लाये थे | अमां, ये तीन तीन उपन्यास दो दो आलोचना के ग्रन्थ, इतनी प्रस्तावनाएँ लिख लाने का काम यूँ ही नहीं मिल जाता | बेटा मेहनत करनी पड़ती है |
अब नेताओं को ही ले लो, हमारे ज़माने में संजय जैसे कद्दावर नेता होते थे जिनसे इन्दिरा भी खौफ खाती थी, अभी जैसा रिमोट वाला परधानमंत्री नहीं होता था बेटा ! राजीव जैसे युगदृष्टा, लालू, मुलायम, नितीश जैसे ईमानदार और सेक्युलर नेता हुए हैं ! सब एक से एक ! किसने मजारों पर चादर नहीं चढ़ाई ? है कोई नॉन सेक्युलर ?
एक ये आज का दिन है | प्रधानमंत्री विदेशों में जा कर भी पूजा करता है | जहाँ शिव मंदिर देखा नहीं की घुस के लगे महा मृत्युंजय जपने | इफ़्तार देता तो न दिखा कभी !!
सांप्रदायिक कहीं का..
(March 12, 2015)