The Missionary Position नाम की किताब आई थी 1995 में, “मदर टेरेसा” को संत घोषित करने से कई साल पहले | अपने नोट्स में लेखक बताते हैं की कैसे पोप जॉन पॉल (II) कई सालों से ऐसे लोगों को तैयार कर रहे थे जिनको संत की उपाधी दी जा सके | किताब की शुरुआत में ही आपको पोटोमैक का जिक्र मिलेगा, ये इलाका वाशिंगटन की अश्वेत आबादी से भरा हुआ है | अनाकोस्टिया को वाशिंगटन की अश्वेत राजधानी भी कहते हैं | यहाँ एक अश्वेत लोगों की भीड़ “मदर टेरेसा” की प्रेस कांफ्रेंस में घुस आई थी | लोगों को धोखे से धर्म परिवर्तन करवाने पर आपत्ति थी | केथी श्रीधर उस घटना के बारे में बताती हैं |
लोगों ने बताया की उन्हें नौकरी चाहिए, रहने और पानी, शौच इत्यादि की ढंग की व्यवस्था चाहिए | उन्हें भीख नहीं चाहिए थी | “मदर टेरेसा” ने कहा, पहले हमें एक दुसरे से प्यार करना सीखना होगा | ज्यादातर लोग इस जवाब पर निरुत्तर हो जाते, मगर इस अश्वेत आबादी ने ये बातें पहले भी कई बार सुन रखी थी | किसी ने पीछे से पुछा, मगर इसमें तो काफी पैसे लगेंगे ?
जब “मदर टेरेसा” से पुछा गया की क्या वो ग़रीबों को उनके हाल से समझौता करना सिखाती हैं ? उनका जवाब था, ग़रीबों को अपने हालत को कबूल लेना चाहिए, उसे ईसा मसीह के सिद्धातों से आपस में बांटना चाहिए | दुनियाँ को गरीबों के कष्टों से बहुत मदद मिल रही है !!
उनकी रूचि ग़रीबों के कष्टों में थी, उसे दूर करने में नहीं | नहीं साहब किसी राष्ट्रिय संघ के घनघोर सांप्रदायिक नेता की लिखी किताब से नहीं हैं ये हिस्से | एक बार Christopher Hitchens को इन्टरनेट पर ढूंढ के देखें | विख्यात समाजवादी और मार्क्सवादी विचारक बताता है विकिपीडिया | अजीब सी बात है की “भागवत” के विरोध का झंडा उठाये कई मार्क्सवादी भी “मदर टेरेसा” के समर्थन में उतर आये हैं |
शिक्षा में कुछ दोष तो जरूर है भारत में !! साहब अपनी विचारधारा तो स्पष्ट कीजिये !!
(February 24, 2015)