जैसे दुश्मन से लड़ने निकले थे खुद भी वैसे ही हुए जाते हैं

हाल फ़िलहाल की सबसे मशहूर फिल्मों में से The Pirates of Caribbean भी होगी | दुनियाँ भर में खूब देखी गई, लगभग सभी किरदारों का काम सराहा गया | कप्तान जैक स्पैरो तो खैर ज़ोरदार था, सारी हरकतें कमीनो वाली करता था लेकिन फिर भी उस से नफ़रत नहीं होती थी | फ़िल्म के एक एक करके कई पार्ट आ चुके हैं अब तो लेकिन जब पहला पार्ट देखा था तो लगा था ये कप्तान जैक स्पैरो ही विलन होगा | मगर थोड़ी ही देर में फिल्म का मुख्य विलन बदल जाता है |
एक और जो अच्छी चीज़ है फिल्म की वो ये है की कोई भी किरदार पूरा पूरा हीरो या पूरा पूरा विलन नहीं है | एक दो पाप करता है तो कोई पुण्य भी किये बैठा है, अगर हीरो दिखने वाला कई अच्छे काम करता है तो उसके पास शर्मिंदा होने की वजहें भी हैं | ब्लैक और वाइट के बीच का एक ग्रे कलर है ज्यादातर किरदारों का | किसी का दामन पाक़ साफ़ नहीं है | वैसे ही जैसे नार्मल जिन्दगी के लोग होते हैं, साधू का भी अतीत है और डाकू का भी भविष्य है | कौन कब बदल गया कुछ पता नहीं होता |
इस फिल्म में सबसे भयानक वाला समुद्री लुटेरा होता है डेवी जोंस | उसका नाम सुनते ही सारे समुद्री लुटेरे भी सहम जाते हैं फिल्म में | इसकी कहानी ये थी की इसने किसी समुद्री बला से प्यार किया और उसने धोखा दे दिया इसे | बस फिर क्या था डेवी जोंस ने अपना दिल निकाल के एक संदूक में बंद कर दिया और उसे छुपा दिया कहीं | दिल था ही नहीं उसके बदन में तो प्यार, मुहब्बत, दया, ममता जैसी चीज़ें भी नहीं थी उसमे ! इसके अलावा उसका जहाज़ भी धीरे धीरे अनोखा हो गया | शैतान से समझौता कर के उसने उसने अपने जहाज फ्लाइंग डचमैन को अजीब सा बना दिया था | यहाँ लोगों की आत्मा के बदले उन्हें अमरता दी जाती थी !
अब समस्या ये थी की अगर हीरो डेवी जोंस को मारता है तो वो जहाज का कप्तान बन जाता | दस साल में एक बार जमीन पे पांव रख पाता और हीरोइन से भी तभी मिल पाता | तो या तो विलन हमेशा जिन्दा रहे या उसे मारने वाला उस जैसा ही हो जायेगा | खैर आखिर में कोई और चारा नहीं बचा तो फिर कप्तान जैक स्पैरो की मदद से विल टर्नर उसे मार देता है | इस तरह से विल टर्नर जिन्दा बच जाता है मगर खुद भी डेवी जोंस जैसा ही हो जाता है |
बुराई से लड़ते लड़ते हम खुद भी कभी कभी वैसे ही हो जाते हैं | शिवाजी मुगलों के खिलाफ़ लड़ने के लिए ही जाने जाते हैं, हरी सिंह नालवा भी, लेकिन ये लोग या इनकी फौज़ कट्टरपंथी नहीं थी | इनके विरोधी जरूर कट्टरपंथी थे | मराठा फौज़ जब अब्दाली से लड़ी थी तब भी उसका तोपखाना इब्राहीम गारदी की कमान में था | 1893 आते आते स्थिति बदलने लगी | अब कट्टरपंथ का जवाब कट्टरपंथ से ही दिया जा रहा है |
जैसे दुश्मन से लड़ने निकले थे खुद भी वैसे ही हुए जाते हैं |

(March 10, 2015)

Labels: