दो गावों की कथा

पुराने ज़माने में ही नहीं अभी भी अगर कोई कुछ सीखने निकलता है तो उसके लिए यात्राओं का बड़ा महत्व होता है | घर में बैठे बैठे कूप मंडूक तैयार होते हैं | तो ऐसे ही एक बार पुराने ज़माने में एक साधू जब अपने चेलों को सिखा रहे थे तो उन्हें लेकर पूरे जम्बुद्वीप की यात्रा पर निकले (पहले भारत को जम्बुद्वीप कहते थे) |
साधू महाराज और उनका दल गाँव गाँव में रुकता, धार्मिक चर्चाएँ होती, लोहे, लकड़ी, कपड़े इत्यादि की जो कारीगरी अलग अलग जगहों पर होती है वो भी छात्रों को दिखाते | अन्य इलाकों से जो चीज़ें वो लोग सीख कर आये थे वो भी गाँव वालों को बताते चलते | इस तरह साधू के दल और जिस गाँव में वो रुकते दोनों का फायदा होता था, सफ़र भी आगे चलता जाता था | किसी भी जगह से निकलते समय तक गाँव के लोगों से ऐसे सम्बन्ध बन चुके होते थे की सब लोग दूर तक छोड़ने आते | साधू सबको आशीर्वाद देकर वापिस विदा करते |
तो ऐसे ही एक गाँव के पास जब साधू और उनका दल रुका तो उन्होंने पाया की गाँव वाले तो बड़ी दुष्ट प्रवृति के हैं ! कैसे पड़ोसी का नुकसान कर दिया जाए इसी चक्कर में लगे रहते हैं | कोई खेत में आग लगाने की योजना बना रहा होता, तो कोई कूएँ में भांग डालने की सोचता रहता | नतीज़ा वही हुआ जो होना था, दरिद्रता फैली थी गाँव में | जब साधू वहां से चलने को हुए तो उन्होंने गाँव वालों को आशीर्वाद दिया, “भगवान् करे तुम सब एक साथ ऐसे ही सदियों तक रहते रहो, किसी को गाँव छोड़कर कहीं न जाना पड़े !”
एक दो दिन की यात्रा पर ही वो दुसरे गाँव में पहुंचे | वहां बिलकुल ही उल्टा हाल था, एक दुसरे की मदद करने के लिए गाँव वाले बिना पूछे ही तैयार रहते थे | अगर बारिश के भी असार लगे तो बाहर सूखते सिर्फ़ अपने कपड़े नहीं पड़ोसी के भी कपड़े समेट के अन्दर कर दिए जाते थे | लौकी, कटहल, जामुन, आम अगर एक के पेड़ में फल गए तो सारे पड़ोसियों को भी बाँट आता था | कोई दिक्कत ही नहीं होती थी किसी को ! कुछ दिन वहां रुक कर जब साधू चलने को हुए तो गाँव वालों को आशीर्वाद दिया, “भगवान् करे, आप सब दूर दूर तक फ़ैल जाएँ !” ऐसा आशीर्वाद सुनकर चेले बड़े हैरान हुए |
थोड़ी यात्रा में तो सब आपस में चर्चा करते रहे की क्यों साधू ने ऐसे उलटे आशीर्वाद दिए | जब कोई एक वजह तय नहीं कर पाए चेले तो उन्होंने एक दिन साधू से ही पुछा की ऐसा आशीर्वाद क्यों दिया | साधू ने बताया, जो दुष्ट प्रवृति वाले लोग थे, वो जहाँ भी जायेंगे अपनी गन्दी मानसिकता ही फैलायेंगे, इसलिए उन्हें एक ही जगह रोके रखना चाहिए | जो भले लोग थे वो जहाँ भी जायेंगे उनकी अच्छी आदतों से लोग सीखेंगे और बेहतर बनेंगे | इसलिए दुष्टों को वहीँ रहना चाहिए और अच्छे लोगों का गाँव उजड़ भी जाये तो देश का भला ही होगा !
इस कहानी के साथ ही बिहार में इस्तेमाल होने वाला एक शब्द “कंजड” याद आता है | ये “कंजूस” का upgraded version होता है | कंजूस बेचारा पैसा बचा रहा होता है, कंजड के पास पैसे की कमी नहीं होती वो दुष्ट होता है | जैसे तीन चार लोग मिल कर अगर एक टैक्सी का किराया भरें तो वो करीब करीब उतना ही होता है जितना बस का किराया होता, सब लोग 200-200 share कर सकते हैं, लेकिन वो सोचेगा नहीं नहीं कार से जाना तो रईसी दिखाना है | ऐसा बिलकुल भी नहीं की उसके पास पैसे कम हैं, वो ये सोचेगा की मेरी मदद से किसी और का फायदा क्यों हो जाये ?
बिहार से बाहर रहने वाले बिहारियों के एक बड़े वर्ग के लिए आपको ये “कंजड” वाली फीलिंग आ जाएगी, इक्का दुक्का भले लोग भी मिलेंगे | मगर अब भारत तो लोकतंत्र है न, सरकार भी यहाँ बहुमत से बनती है |
Community का Impression भी तो Majority से ही बनेगा !
बाकि के भले लोगों के लिए हमारी दुआ है की आपकी उम्र कभी सालों में नहीं, किलोमीटर में बढ़े !!

(March 14, 2015)

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