भारत में चाय पे चर्चा नहो ऐसा तो हो ही नहीं सकता | अगर किसी आम मध्यमवर्गीय परिवार में भी आप चले जाएँ भारत के किसी कस्बे में, तो सुबह सुबह की चाय पर ही ज़ोरदार राजनैतिक चर्चा सुनाई दे जाएगी | अभी तो मौसम भी बदल रहा है इसलिए भी और फिर बजट का भी मौसम है तो उस कारण भी चर्चा बड़ी गर्म होती है | शाम में घरों में अक्सर महिलाएं ही होती है, तो शाम की चाय की चर्चा, कुछ बढ़ती सब्जियों की कीमत की होगी, कुछ फलने के घर होनेवाली शादी की, कुछ मशहूर दुकानों में आई नयी साड़ियों की भी चर्चा सुनाई दे देगी | नहीं नहीं निंदा पुराण नहीं चलता, वो तो सिर्फ़ पुरुष चौराहे की दुकानों पर अपने अफ़सर की नुक्ता-चीनी करते पाए जाते हैं | घरों में शाम की चाय पर निंदा पुराण नहीं चलता |
खैर चाय की बात हो और दुकानों पर जमने वाली चाय की चौपाल की चर्चा न हो ऐसा कैसे ? भाई अलग अलग शहरों में चाय का अलग अलग कल्चर है | चाय के प्याले का साइज़ भी अलग होता है और चाय का स्वाद भी अलग होता है | जैसे दक्षिण भारत में आपको चाय की प्याली के साथ एक तश्तरी भी दी जाती है | चाय तश्तरी में डाल कर आराम से ठंडी कर कर के सुड़कते रहें | चर्चा भी चलती रहेगी | ये उधर ज्यादा उपजने वाली कॉफ़ी के कारण है शायद, महाराष्ट्र तक चलता है ये कल्चर | पुणे तक गए लोगों ने तो दुर्गा कॉफ़ी का नाम सुना ही होगा | उधर चाय के साथ कॉफ़ी भी चलती है | मुंबई वगैरह में तो cutting चाय भी प्रसिद्ध है,मतलब एक प्याली चाय में दो लोग बाँट लेते हैं |
अगर कहीं आप पूर्वोत्तर राज्यों की तरफ़ गए तो बागानों के आस पास तो चाय मुफ़्त की होती है | ऐसे ही कोई थमा जायेगा प्याली भर चाय | आराम से चुस्कियां लेते रहिये | बंगाल में भी चाय बड़ी सस्ती है, दो तीन रुपये में एक प्याली चाय शायद ही कहीं और मिले | कश्मीर की साइड कहवा होता है, चाय ही है बस चाय बुलाते नहीं उसे | अब अगर कहीं आप उत्तर प्रदेश में हैं तो वहां चाय के ग्लास बड़े बड़े होते हैं | कोलकाता, आसनसोल की तुलना में लगभग दोगुनी चाय होगी एक बनारसी चाय के ग्लास में | बनारस में चाय का कल्चर भी जोरदार है | किसी भी दूकान पर आराम से आपको निम्बू वाली लिकर चाय और दूध वाली चाय दोनों मिल जाएगी |
इधर कुछ दिन पहले बनारस जाना हुआ तो अस्सी के पास पप्पू की अडी पर महफ़िल जमी | कुछ तो पहचान के ही लोग थे,कुछ और भी आस पास के लोग चाय की चुस्कियां लेते अखबार की एक खबर खंगाल रहे थे | चर्चा बाबा राम रहीम की फ़िल्म पर छिड गई | कुछ का कहना की भाई साधू है तो फ़िल्म नहीं बनाएगा ऐसा कहाँ लिखा है ? कुछ कहें की ये कहे का साधू ! ये तो साधू ही नहीं है ! ये संसदीय भाषा में सुनाया है हमने | पप्पू की अडि पर जिस भाषा में चर्चा चल रही थी उसके लिए लोग “असंसदीय भाषा” नामक जुमला इस्तेमाल करते हैं | काफी ज़ोरदार खींच तान के बाद आखिर तय हुआ, की भइये साधू है या नहीं ये अलग मसला है, लेकिन अगर“हैदर” जैसी मुस्लिम विरोधी, “pk” जैसी धर्म का मजाक उड़ाने वाली, और भी न जाने कैसी कैसी फ़िल्में बनने लगी हैं तो किस आधार पर इसे रोकोगे ? सब करते हैं तो मैंने किया तो क्या गलत किया का लॉजिक तो है बाबा राम रहीम के पास !
माहौल चर्चा का जरा ठंडा हुआ, एक आधे नेताओं की खिल्ली उड़ाई गई और दूसरी प्याली चाय की मंगाई गई | इधर किसी का ध्यान गया की भैया ये काफी कम बोलते हैं, भोजपुरी नहीं आती क्या ? फिर पता चला बिहारी हैं, तो किसी ने कहा की बिहार में भोजपुरी चलती तो है ! भोजपुर ही पूराबिहार में है, आती क्यों नहीं होगी ? तभी किसी का ध्यान गया की आज कल लड़के अँगरेज़ हुए जाते हैं | अपनी भाषा तो भूल ही गए ! हमारी भाषा को अश्लील कहते हैं और खुद जब बड़ों को सम्मान से बुलाने के बदले “YOU” कहें तो उस से अपनापन छलकता है ! अब भाई अपने बचाव में उतरना पड़ा |
ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं होता की बिहार में अलग अलग पांच - छः प्रमुख बोलियाँ हैं | उत्तर प्रदेश से लगभग पटना तक भोजपुरी चलती है, पटना के आस पास मगही इस्तेमाल होती है, समस्तीपुर के आस पास के इलाकों में बज्जिका, मुंगेर और भागलपुर में भागलपुरी या अंगिका, दरभंगा से लेकर नेपाल तक मैथिली | जैसे बंगाल का कोई आदमी बांग्ला सुनते ही समझ सकता है की ये आदमी बंगाल के किस इलाके का है, वैसा बिहारी हिंदी सुन के कर सकता है | ज्यादा से ज्यादा पांच मिनट लगेंगे इसमें, जैसे किसी दुकान से दो चाय लेते समय मैथिली बोलने वाला कहेगा “दो ठो चाय देना”, और भोजपुरी या मगही बोलने वाला कहेगा “दो गो चाय देना” | एक “ठो” और “गो” का अंतर ही उसकी भाषा के बारे में हमें काफ़ी कुछ बता देता है |
“कोस कोस पर पानी बदले,चार कोस पर बानी”, ऐसा भक्त कवि, यूँ ही थोड़े न कह गए थे | हालाँकि भभुआ में इस्तेमाल होने वाली भोजपुरी और आरा में चलने वाली भोजपुरी में भी अंतर है लेकिन इसके अलावा भी एक ख़ास चीज़ है की मैथिली बहुत ज्यादा तमीज़ से बोली जाती है | अंग्रेजी की तरह “आप” के लिए भी “you”, “तुम” के लिए भी “you” और “तू” के लिए भी “you” से आपका काम नहीं चलेगा | इसमें कम से कम छः तरीके से बात करनी पड़ती है |
जैसे “तुम जाओगे ?” जैसा सवाल अगर आप अपने से छोटे से करें तो “तू जेब्हीं ?” कहेंगे | यही अगर अपने बड़े भाई से पूछना हो तो “तू जेब्हक ?” कहना पड़ेगा | अगर अपने चाचा जैसी उम्र के किसी से पुछा तो “अहां जैब ?” जैसा कुछ कहना होगा | अगर अपने ससुर टाइप किसी से बात कररहे हैं तो आपको और ज्यादा फॉर्मल होना पड़ता है, उस हालत में आप कहेंगे “ई जेथिन ?” समधी जैसे रिश्तों में कहा जायेगा "अपने जैल जेते ?"
अब ये पांच तो थे साधारण वाले तरीक़े | छठा तरीका बात करने का सबसे मजेदार होता है | मजेदार इसलिए क्योंकि आपको ये तरीका बचपन से सिखाया नहीं जाता, खुद ही सीखना पड़ता है | मजेदार इसलिए भी क्योंकि ये तरीका आप एक ही जगह इस्तेमाल कर सकते हैं | होता क्या है की मैथिली बोलते वक्त आप अपनी पत्नी का न तो नाम लेते हैं, ना ही उसे तुम कह सकते हैं | “आप” ही कहना होगा, यानि की अगर पूछना हो “तुम जाओगी ?” तो कहना पड़ेगा “अहां जेबए ?” चाहे आप जितने भी तरीके इस्तेमाल कर लें, आदर सूचक लगाना ही होगा पत्नी से बात करते समय |
ये इसलिए याद आ गया क्योंकि कुछ नारीवादी ये चर्चा कर रहे थे की अपनी पत्नी को सबसे पहले “आप” बुलाने वाला बड़ा नारीवादी होगा | उसने अपनी पत्नी को सम्मान दिया | इस चर्चा में याद आया की मिथिला के राजा जनक होते थे, जिनकी बेटी थी सीता | मेरे हिसाब से नारीवाद उनसे पहले किसी ने नहीं सिखाया होगा | चाय भी ख़त्म हो चली, चलिए अब काम देखें कुछ और |
(February 27, 2015)