कभी
ऐसी कोई फिल्म देखने गए हैं जो बेहद बकवास हो ? जिसका हीरो न पसंद आये, हीरोइन
चुड़ैल लगे, डायरेक्टर गधा हो, एडिटर कामचोर टाइप, गाने बेहूदा ? मतलब कुल मिला के
टोटल स्यापा जिसे कहते हैं वैसी वाली फ़िल्में ? वो भी पैसे लगा के किसी
मल्टीप्लेक्स में ? हमने तो दो चार बार की है ऐसी हरकत !
अच्छा
जब ऐसा होता है तो करते क्या हैं आप ? पैसे लग गए हैं इसलिए बैठ कर पूरी फिल्म देख
लेते हैं या बाहर निकल आते हैं ? कोई सीन तो अच्छा होगा इस इंतज़ार में बैठे रहते
हैं क्या ? हम उठ के बाहर निकल जाते हैं | जब बाहर निकलने लगते है तो बड़ा अजीब
माहौल होता है |
दो
चार लोग अजीब तरीके से मुंडी हिलाते हैं, दो चार “च्च, च्च, च्च” वाली अजीब आवाज
निकालते हैं | घूरा तो ऐसे जाता है की नजर कमीज़, बनियान पार कर के चमड़ी के अन्दर
तक चीड़ जाती है | इन विस्फरित निगाहों को हम “समाज” कहते हैं | इनके सामने पड़ते ही
बदन पर कीड़े रेंगने जैसी फीलिंग आने लगती है | हमेशा तौलते ही रहते हैं ये लोग
नजरों से ! कहीं छुप जाओ, कुछ ना करने की कोशिश करो, बुर्का ही डाल लो पूरा ! मगर
ना, कोई फायदा नहीं, साहब अपना जजमेंट तो देंगे ही |
एक ख़ास तरीके
से बर्ताव करो, एक ख़ास तरह के कपड़े पहनो | बालों का डिजाईन ऐसा हो, दाढ़ी होगी की
नहीं होगी, होगी तो कैसी होगी, मूछें रखनी है या नहीं, रखनी है तो कितनी लम्बी,
आवाज़ इतनी ऊँची हो, sandal में इतना हील, स्कर्ट इतनी लम्बी, जीन्स इतनी टाइट |
शर्ट ऐसे रंग का, मोटरसाइकिल वैसे डिजाईन की, मुस्कुराना इतना, देखना सिर्फ़ इस
लड़की की तरफ़ !
ये
टीवी सीरियल देखना, वो फ़िल्में मत देखना, पढ़ना इस कॉलेज में, सब्जेक्ट वो वाला
चुनना ! नौकरी ऐसी हो, घर इतने बजे लौटना, गाने ऐसे सुनो, काम वैसा करो | कुल मिला
के बस हमारी पसंद के हो जाओ | बाकि जो है सो तो हइये है !
इन
नियमों पर नाकाम होना, दुनियाँ की नज़रों में नीचा गिरना है | नाकामयाबी का ठप्पा
अपने पे लगवाने जैसा, लेकिन समस्या ये है की कभी कभी यही करना पड़ता है | कोई चारा
ही नहीं इसके सिवा ! चार लोग क्या कहेंगे ये सोचना बंद करना सबसे जरूरी काम होता
है | कुछ बेकार फिल्मों के बीच से ही उठ जाना चाहिए, पैसे तो ख़राब हो ही चुके हैं,
समय क्यों ख़राब करना ? कुछ फालतू किताबों को फेंक देना चाहिए, और हाँ कुछ बेकार
नौकरियां भी बदल लेनी चाहिए | रिश्तों के बारे में कुछ नहीं कहते, वो सब समझदार है,
तो कैसे लोगों का साथ छोड़ना है पता होगा |
क्या
है की एक ही तो जिन्दगी है, बार बार मिलेगी नहीं | मरते वक्त कम से कम ये अफ़सोस न
हो की चार लोग क्या कहेंगे इस डर से ये काम नहीं किया | यही वजह है की हम अक्सर
घटिया फ़िल्मों से बाहर निकल आते हैं | बाहर ना निकल के भी देखा है, नुकसान ज्यादा
हो जाता है | पूरी “Kick” पड़ी थी पिछली बार |
तो हम
तो बाहर निकलेंगे भाई, आपकी असहमति मेरे घंटे से !!
(February 16, 2015)