डालो लाल हवेली में

पुराने ज़माने में बिहार UP में अपराधियों की तूती बोलती थी | एक से एक सूरमा हुआ करते थे बिहार के एक डाकू तुतली सिंह के आने की खबर पर थाने बंद हो जाने का भी किस्सा है, सड़कों पर दौड़ा दौड़ा कर विरोधी गैंग वाले को मारना तो आम बात थी | ना ना किसी छोटे कस्बे में गाँव में नहीं होता था ऐसा, पटना और लखनऊ भी अपवाद नहीं थे | क्या मुजफ्फरपुर क्या बेगुसराय, कानपुर क्या और इलाहबाद क्या ? दिन दहाड़े कहीं थ्री नॉट थ्री गूँज जाता था | देसी कट्टे से शुरू हुआ ये किस्सा धीरे धीरे नेपाल के रास्ते हथियारों की तस्करी पर पहुंचा |
उस ज़माने में कहते हैं की दाउद का ड्राइविंग लाइसेंस भी मुज़फ्फरपुर में बना था | तो साहब हथियारों की तस्करी का सबसे बड़ा नाम था बृजबिहारी सिंह | बिहार के इस बाहुबली ने UP के आखरी छोर तक अपनी सल्तनत जमा रखी थी | उसी ज़माने में UP में श्रीप्रकाश शुक्ला का प्रादुर्भाव हुआ | नयी उम्र का लड़का था और पैसे कमाने का शौक़ीन | साथी भी राजन तिवारी और ___ जैसे ! रेलवे के बड़े ठेके जब ये हड़पने लगा तो बृजबिहारी ने श्रीप्रकाश पर हमला करवा दिया | जैसे तैसे श्रीप्रकाश उस हमले में बच निकले | फिर शुरू हुआ गैंग वार |
कई छुटभइयों को तो श्रीप्रकाश शुक्ला ने दौड़ा दौड़ा कर मारा | एक दिन जब बृजबिहारी अपना इलाज करवा रहे थे तो सुबह IGIMS हॉस्पिटल के ही कंपाउंड में टहलने निकले | उनपर AK 47 दो बार खाली की गई थी सुबह सुबह | इसका मुक़दमा अभी भी राजन तिवारी पर चल ही रहा है | तो ऐसे में जब लोकतंत्र के खम्भों की याद आई जनता को तो सबने हाथ खड़े कर दिए | विधायिका परोक्ष समर्थन देती थी, कार्यपालिका डर के मारे सबूत नहीं जुटती थी और न्यायपालिका कहती की बिना सबूत और गवाह हम क्या करें ?
ऐसे कठिन दौर में लोकतंत्र के चौथे खम्भे से एक आवाज़ आई ! India’s Most Wanted पर गूंजी सोहेब इलियासी की आवाज़ ! “अपने आप को तीस मार खां समझने वाले श्रीप्रकाश शुक्ला, तुम्हारी भलाई इसी में है की तुम फ़ौरन से पेश्तर अपने आप को कानून के हवाले कर दो !!” बस फिर क्या था ! सन्नाटा फ़ैल गया ! ई ससुरा पतरकार तो गया ! चौक चौराहों पर यही चर्चा होने लगी | लेकिन साहब जनता जनार्दन ने आवाज़ सुन ली थी | ऐसी आवाज़ खाली कैसे जाती ? थोड़े ही दिन बाद जब श्रीप्रकाश शुक्ला पहुंचा अपनी रखैल से मिलने तो दर्जन भर थानों के फ़ोन बज उठे |
पुलिस ने घेरा डाला और श्रीप्रकाश शुक्ला लौटते वक्त कुत्ते की मौत मारा गया |
कहानी यहीं ख़त्म होती तो ठीक था | मगर कई अपराधियों के खिलाफ़ मोर्चा खोले ये सोहेब इलियासी दरअसल भेड़ की खाल में भेड़िया था | उसने अपनी पत्नी का घर में ही बेदर्दी से क़त्ल कर डाला था | पुराने ज़माने में सिर्फ मेन स्ट्रीम मीडिया था तो पोल कौन खोलता ? कई दिनों तक मामला दबा रहा | मगर कहते हैं “जो चुप रहेगी जबान ए खंज़र तो आस्तीन का लहू पुकारेगा !” आखिर इलियासी को पुलिस ने घसीट कर सरकारी ससुराल पहुँचाया |
किसी और को पापी साबित कर देने से आपके पाप तो कम होते नहीं ना साहब ? क्या है की स्टिंग पर स्टिंग “AAP” और खान्ग्रेस का तो जारी कर दिया, मगर जिसके घर में बैठ कर ये दलाली चल रही थी उसे कब निकालोगे ?
कहाँ ले जायेगा इतने “पुण्य” समेट के ? "आज तक" कोई बच पाया है ? डालो इसे भी लाल हवेली में...

(March 13, 2015)

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