एंटी नारीवाद

काम के सिलसिले में ज्यादातर इंसान बड़े शहरों में जाता है, छोटे कस्बों में जाना जरा कम होता है | अब एक तो आप अपने शहर से निकल के दुसरे में आ गए हैं, जान पहचान कम है वहां, रास्ते मालूम नहीं, अक्सर टैक्सी लेने के खर्चे का भी सोचना पड़ता है | तो ऐसे में इस्तेमाल होता है पब्लिक ट्रांसपोर्ट, मेट्रो, बस वगैरह | अगर इनसे कहीं जाने में एक घंटा लगता हो तो हम बिलकुल खाली होते हैं, बैठने की जगह अक्सर नहीं मिलती तो खड़े कुछ न कुछ सोच ही रहे होते हैं | अब आपको तो पता ही है की खाली दिमाग शैतान का घर होता है तो हम नारीवादियों को गाली दे रहे होते हैं | आप पूछेंगे क्यों ?

कतार (queue) नाम की भी कोई चीज़ होती है ये ज्यादातर औरतों को समझ में ही नहीं आता ! 40 के आस पास की अधिकतर महिलाएं मान कर चलती हैं की चाहे कितनी भी लम्बी कतार हो वो आराम से आगे जायेंगी, काउंटर में हाथ घुसेड़ कर अपना काम करवाएंगी और चलती बनेंगी | ज्यादातर बड़े शहरों में महिलाओं के लिए अलग काउंटर होते हैं | ये कतार तोड़ कर आगे निकल जाना कोई नारी सशक्तिकरण नहीं होता मैडम, इसे शोषण कहते हैं | कतार के सबसे पीछे खड़े बेचारे ग़रीब इसके खिलाफ़ आवाज़ भी नहीं उठा पाते !

दिल्ली की एक आर्मी मेस में एक मित्र ने समझाया था की उनके लिए बार एक privilage होता है, right नहीं होता | इसीलिए बार में स्टाफ आपसे इतनी तमीज़ से पेश आता है की आप हमेशा अपनी हदें याद रखें | सम्मान को अधिकार न समझ लें ! ये बात आपको मेट्रो में घुसते ही समझ आ जाएगी | महिलाओं के लिए अलग डब्बा होता है, वो अधिकार है आपका, हर बोग्गी में कुछ सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित भी होती हैं, वो भी अधिकार है आपका | लेकिन जब कोई सम्मान वश आपके लिए अपनी सीट खाली कर देता है तो उसे अपना अधिकार क्यों समझ लेती हैं ये लोग ? खुद किसी बुजुर्ग या बच्चे के लिए महिलाओं की आरक्षित वाली सीट छोड़ेंगी क्या ? सम्मान और अधिकार में फ़र्क तो समझिये मैडम !

दिल्ली में तो हालत ही ख़राब हो जाती है | सारे अख़बार और टीवी वाले इसे rape capital बुलाने लगे हैं | ना चाहते हुए भी हर शरीफ़ बेचारे मर्द पर ये आतातायी होने का lable दिल्ली पहुँचते ही चिपक जाता है | ऐसी गन्दी निगाहों से घूरा जाता है ! बाय गॉड कितने लीटर शक़ दिमाग में भर के निकलती हैं ये लोग ? आदमी बेचारा एक कोने में खम्भे से टिका मोबाइल में कुछ कर रहा है और पांच फुट दूर खड़ी औरत ऐसे शक भरी नज़रों से घूरती है जैसे की निगाहें हटते ही वो झपट्टा मारने वाला है मैडम पर ! क्या तरीका है यार ! कुछ लोग शरीफ़ भी तो होते हैं | कोई नहीं दिखा आज तक ढंग का ?

“अच्छा ये मुर्गी के घोंसले जैसे बाल ढँक के क्यों नहीं चलती हैं मैडम आप ?”, ये पूछने का मेरा मन पचास बार तो हो ही चुका होगा | पिटने के डर से कभी पूछ नहीं पाए | एक तेज़ राईट या लेफ्ट टर्न लेने पर जोर से सर हिलाने पर आपके पीछे खड़े वाले आदमी की क्या हालत होती है पता है ? Try कीजियेगा जरा कभी | चलिए वो नहीं करना ? एक काम कीजिये अपने सर में हाथ फिरायिये एक दो बाल करीब डेढ़ दो गज़ के तो आ ही जायेंगे हाथ में | अपनी किसी शादीशुदा मित्र के पति की स्वेटर में उस बाल को चुपके से फंसा दीजिये कहीं कंधे के पास | और फिर अपनी सहेली को पूछ लीजिये, “वो स्वेटर में कुछ फंसा है न ?” देखिये क्या होता है उसके बाद | जो होगा उसे समाज शास्त्र की भाषा में “मानवाधिकारों का हनन” कहा जाता है |

दिल्ली के आस पास (चंडीगढ़ तक) मुझे ऑफिस की पार्टियों में बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है | आप नहीं समझेंगे ख़तरे कितने प्रकार के होते हैं सरकार इसलिए बताना पड़ रहा है | वैसे तो पचपन किलो का वजन बहुत ज्यादा नहीं होता, लेकिन जब वो वजन छः इंच की पेंसिल हील पर हो और वो हील आपके पांव पर पड़ जाए तो क्या होता है आपको अंदाज़ा है ? “मर्द को दर्द नहीं होता” फ़िल्मी डायलॉग था सरकार, दर्द होता है, होता है, i repeat होता है !! तो हाई हील पहन के मेरे ज्यादा पास न आयें, दयनीय प्राणी हैं molestation का मुक़दमा भी नहीं कर सकते हम तो !

पब्लिक ट्रांसपोर्ट में भीड़ आपके लिए भी उतनी ही है जितनी मेरे लिए | बिलकुल असुविधाजनक है ख़ास कर के सुबह दस बजे और शाम छः बजे के आस पास | लेकिन पर्सनल स्पेस जैसे आपका डेढ़ फुट का है वैसे ही मेरा कम से एक फुट का तो दीजिये न | प्लीज चिपक जाए कोई भी आ कर ये हम लोगों को भी बिलकुल पसंद नहीं होता | सांस तो लेने दो यार !

इन सब से बुरा तब लगता है जब सिर्फ लड़की हो इसलिए आपकी तो कोई गलती होती ही नहीं | सारा कसूर बेचारे लड़के का है | और कहीं बेचारा ग़रीब मजदूर टाइप हुआ तो फिर तो आपसे बहस कर के पाप कर दिया है बेचारे ने ! ये निरीह प्राणी बनने वाली क्यों नहीं कभी दिखती इन “बड़ी बिंदी वालिओं” को ? गलती कोई हो या नहीं हो पिट जाता है मजदूर बेचारा | बहुत नाइंसाफी है !

सोचा तो था की वो Dove जैसी कंपनियां जो लड़कियों के लिए deoderent बनाती है उसके इस्तेमाल पर भी दो लाइन लिख डालें |

लेकिन अब मुक़दमा हो जायेगा हमपर, हजामत सलामत लेकर निकल लेते हैं !

(February 25, 2015)

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