कंप्यूटर लगातार चलाने के शारीरिक नुकसान कई लोगों ने गिनाये होंगे | आखें कमज़ोर हो जाती हैं, रीढ़ की हड्डी पर असर पड़ता है जैसी कई व्याधियों के होने की खबर किसी न किसी अखबार में छपती रहती है | एक नुकसान और होता है जिसके बारे में कोई नहीं बताता | कंप्यूटर सॉफ्टवेर बहुत तेज़ी से पुराना हो जाता है, जबतक आप एक चलाना सीखेंगे उस से नया version market में आ जाता है | इसका नतीज़ा ये होता है की हम लोग सन 2000 की भी बात करें तो कहते हैं “पुराने ज़माने की बात है”, 1970 तो “बहुत पुराना जमाना हो जाता है | ऐसे ही एक बहुत पुराने ज़माने का किस्सा है, खरहे और शेर का |
खरहा कहते हैं ख़रगोश को, ऐसा शहरी वाला सफ़ेद जैसा नहीं होता वो कभी भूरा होता है कभी चितकबरा भी होता है | शायद कभी देखे हों आपने | तो हुआ यूँ की किसी जंगल में बहुत से खरहे रहते थे, जाहिर है जंगल में शेर भी था ही | लेकिन खरहों को शेर से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था | ऐसे टुच्चे जानवरों का शिकार वो अपनी शान के खिलाफ़ मानता था | तो शेर कभी नील गाय कभी हिरण मारा करता था |
एक साल जंगल में बारिश बहुत कम हुई, तो घास सूखने लगी | हिरण और नील गाय जैसे
घास खाने वाले जानवर दूर दुसरे घास के मैदानों की तरफ चले गए | एक एक कर के जब झुण्ड ख़त्म हो गए तो शेर को परेशानी हो गई, अब खाए क्या ? खरहे लेकिन जंगल में ही थे | वो जड़ भी उखाड़ कर खा लेते थे इसलिए उन्हें सूखे से फ़र्क पड़ा नहीं था | अब शेर ने खरहों का शिकार शुरू कर दिया ! रोज़ पांच छः को मार के खा जाए |
खरहे बिचारे परेशान ! इस नयी मुसीबत से कैसे निपटें ? तो उन्होंने सभा बुलाई और बात चित शुरू की कि क्यों नहीं खुद ही चार पांच खरहे शेर के पास चले जाएँ, बाकि पर से तो डर हटेगा | अब एक खरहा वहां थोड़ा जवान टाइप था | गुलामी उसके खून में थी नहीं, शायद 1950 के बाद पैदा हुआ होगा | उसने कहा आप लोग फ़िक्र न करें मैं कल सुबह निपट लेता हूँ इस शेर से | बुड्ढे कैसे खडूस होते हैं आप तो जानते ही हैं, एक डांट पिलायी छुटके को ! अबे हमने क्या धूप में बाल सफ़ेद किये हैं ? बड़ा आया शेर से निपटने वाला ! ऐसे डायलॉग सुना कर भगा दिया सभा से बेचारे को |
रात भर में बैठक में कुछ फैसला हो नहीं पाया था, इतने में छुटका खरहा अंगड़ाई लेता पहुंचा | कुछ तय किया आप लोगों ने ? पूछ बैठा | जा तू ही निपट ले, हमारा सर और न खा, कहके बाकि बुड्ढे खरहों ने उसे भगा दिया | खरहा पहुंचा शेर की गुफ़ा पर और आवाज़ दी | शेर भौचक्का होता बाहर आया, खरहे ने कहा, मियाँ तुम दोनों तो मिल कर हमारी आबादी ही निपटा दोगे ! आपस में तय क्यों नहीं कर लेते की कौन कितने खरहे खायेगा ? शेर और चकराया ! बोला अबे पिद्दी, जानता नहीं जंगल में मैं एक ही शेर हूँ ? खरहे ने पुछा, अच्छा ! फिर वो कूएँ वाला कौन है ?
कूएँ वाला ? शेर गुस्साया, खरहे ने कहा, हाँ वही जिसकी लाल लाल आँखे हैं, डरावने आयल है, वो वाला ! शेर ने कहा मुझे भी दिखा कहाँ है वो कपटी जो मेरे जंगल में घुस आया है | खरहा एक गहरे कूएँ पर शेर को ले आया और कहा झाँक कर देख लो अन्दर ही होगा | शेर गुस्से से लाल पीला होता कूएँ में झाँकने लगा | अन्दर लाल आँखों और झबरे आयल वाली अपनी ही परछाई दिखी | शेर दहाड़ा, कुँए से भी गूंजती दहाड़ की आवाज़ आई | दो चार बार दहाड़ने के बाद शेर आपे से बाहर हो गया | उसने कुँए में छलांग लगा दी ! और जैसा की मेरी कहानी के अंत में होता है उसके बाद खरहे जंगल में ख़ुशी ख़ुशी रहने लगे |
मगर इस कहानी से याद आया की दिल्ली में तो हमारा हाल ही में पानीपत कर डाला था | दिल्ली जीत के आप शेर भी हो गए थे | हम भी खरहों की तरह बिल में दुबके रहते थे डर के मारे ! ऐसे में क्या जरुरत थी ? मेरा मतलब जरूरत क्या थी ज़ोरदार दहाड़ सुना के छलांग मारने की ?
ओंकारा में श्री लंगड़ा त्यागी जी कहते हैं “बेवक़ूफ़ और चू@#$ में धागे भर का फ़र्क होता है, और जो धागा हैंचो तो कौन है बेवक़ूफ़ और कौन चू@@# करोड़ टके का प्रश्न है भैया !” खुद को बेवक़ूफ़ और अपने भक्तो को पता नहीं क्या साबित कर डाला !!