महाभारत का युद्ध शुरू हो चुका था | कौरवों की ओर से भीष्म सेनापति थे, और पांडवों की सेना को हर रोज भारी नुकसान झेलना पड़ता था | पांडवों के लाख़ प्रयासों के बाद भी किसी तरह भीष्म काबू में नहीं आते थे | समस्या ये थी की एक तो भीष्म अपने समय के सबसे भयावह योद्धा परशुराम के शिष्य थे | शिष्य भी ऐसे वैसे नहीं थे, ऐसे शिष्य थे जिस से गुरु भी जीत नहीं पाया था |
एक दूसरा कारण था भीष्म का अनुभव | उनका युद्धों का जितना अनुभव था उतनी तो महाभारत के किसी योद्धा की आयु भी नहीं थी | एक तीसरा कारण था पांडवों का अपने पितामह के प्रति अनुराग | अर्जुन उन्हें कड़ी टक्कर दे सकते थे लेकिन आधे मन से ही लड़ते थे तो भीष्म हारते कैसे |
रोज़ ही नयी व्यूह रचना होती रोज़ पांडव योद्धा खेते रहते | श्वेत और उत्तर जैसे शूरवीर जो भीष्म के प्रति उतना प्रेम नहीं रखते थे वो भीष्म को रोकने पहुंचे | नतीज़ा वही होना था जो हुआ | विराट के दोनों पुत्र उत्तर और श्वेत, वीरगति को प्राप्त हुए |
भीष्म जब आक्रमण करते तो पांडव सेना को ऐसा लगता था की उनका मुकाबला एक नहीं कई कई भीष्म कर रहे हैं | इतने का बाद भी अर्जुन और अन्य पांडव अधूरे मन से भीष्म का मुकाबला करते |
युद्ध का नौवां दिन था |
पांडव सेना के कई वीर मारे जा चुके थे | अर्जुन आज भी आधे मन से भीष्म से लड़ रहे थे | कृष्ण के बार बार कहने पर भी अर्जुन ने पूरा जोर नहीं लगाया | आखिर कृष्ण को गुस्सा आ गया | हथियार न उठाने की उनकी प्रतिज्ञा थी, लेकिन रथ का पहिया तो हथियार होता नहीं ! क्रुद्ध कृष्ण रथ का पहिया उठा कर भीष्म का वध करने कूद पड़े ! अर्जुन पीछे दौड़े और उनका पैर पकड़ कर उन्हें रोका | जैसे तैसे प्रतिज्ञा याद दिला कर रथ में वापिस बिठाया | भीष्म कृष्ण को रथ का पहिया उठाते देख कर ही हथियार डाल चुके थे | वो खड़े मुस्कुराते रहे |
सरकार के नौवें महीने में रेल बजट के बाद का प्रधानमंत्री का लोकसभा भाषण सुना अभी अभी | अरे रखवाओ कोई चक्का इस से ! पूरा विपक्ष ही साफ़ करेंगे !
कुछ काम बाकि महारथियों के लिए तो छोड़ दो साहेब !!
(February 27, 2015)