सवैया
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दीनसहायक नाम तुम्हार सुना बहु ग्रंथन में महाराज |
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है शबरी गजगीध अजामिल ते अजहुं जिहिकोयशछाजा ||
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जो करणी सुमिरों इनकी तबहीं मन धैर्य्य लहै रघुराज |
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दिन पुकारकरै ललिते प्रभु बेगि द्रवों हे गरीब नेवाजा ||
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सुमिरन ||
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गया न किन्ही जिन कलयुग माँ
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काशिम घोडा दान नहिं दीन ||
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जनमत बैरी जिन मारा ना
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नाहक जन्म जगत में लीन १
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पूजा कीन्ही नहिं शम्भू की
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अक्षत चन्दन फूल चढ़ाय ||
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फिरि गलमाँदरी जिन बजी ना
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मुख ना बम्ब बम्ब गा छाय २
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भसमरमायो नहिं देहि माँ
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कबहूँन लीन सुमिरनी हाथ ||
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सोचन लायक ते आरय हैं
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जिन नहिं कबों नवायोमाथ ३
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को अस देवता रहै शम्भुसम
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जिनको पूज्यो राम उदार ||
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वेद उपनिषद के ज्ञाता रहैं
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जिनबल भयो रावणछार ४
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छुटी सुमिरन गै देवन कै
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शाका सुनो शुरमनक्यार ||
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ब्याह बखानों मैं आल्हा का
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होई तहाँ भयानक मार ५
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अथ कथाप्रसंग
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नैनागढ़ का जो महाराजा
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सजा सबै भांति कर्त्तार ||
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राजा इन्दर का बरदानी
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औ नैपाली नाम उदार १
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तिन घर कन्या इक पैदा भे
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सबबिधि रूप शीलगुणखान ||
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पढ़ीकै विद्या सब जादू की
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कछुदिनबाद भई फिरिज्वान २
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संगसहेलिन के खेलति भय
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सुनवाँ कही तसुका नाम ||
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खेल लरिकईं को जाहिर है
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लरिका ख्यलें चारिहूयाम ३
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खेलत खेलत फुलबगिया गईं
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सब मिलि करैं फुलनकी मार ||
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कटहर बड़हर त्याही बगिया में
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कहुं कहुं फूल रही कचनार ४
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उठे सुगंध कहू चन्दन की
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कतहूँ कतलिन खड़ी कतार ||
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गुम्मज सोहैं मोमशिरिन के
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कहूँ कहुं फुलीं चमेलीडार ५
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बेला फूले अलबेला कहुं
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खिन्नन लाता गईं बहुछाय ||
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हर्र वहेरा सांखो बिरवा
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सीधे चले ऊपर को जायें ६
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बरगद छैलें हैं नीचे को
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फैले भूमि रहे नियराय ||
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जैसे सम्पति सज्जन पावैं
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नीचे शीश झुकावट जाएँ ७
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शीशम जानो तुम नीचनको
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आधे सरग फरहरा खाएं ||
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चलै कुल्हाड़ा जब नीचेते
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गिरिके टूक टूक ह्वैजाएँ ८
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को गति बरणे तहाँ अधमनकै
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सो हैं करिल रूपते भाय ||
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टाल तमालन कै गिनतिना
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कदमन गई सघनता छाय ९
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फुली नेवारी अब अगस्त्य हैं
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आमनडार क्केलिया बोल ||
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सोहें अशोकन के बिरवा भल
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तीनो चाहं बयारी डोल १०
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गुलर जामुन पाकर पीपर
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कोनन खड़े वृक्ष सरदार ||
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तार अपारन के बिरवा बहु
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कहुं कहुं खड़े वृक्ष कह्वार ११
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टेसू फूलें कहुं सोहत हैं
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जैसे सोहें लडैता ज्वान ||
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रूप गुलाबन को देखंत खन
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फुलनछांडीदीन अभिमान १२
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कौन कनेरण को वर्णन कर
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चांदनि चाँद सरिस गै छाय ||
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फूल दुपहरी के भल सोहैं
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मोहैं मुनिन मनै अधिकाय १३
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गेंदन केरे बहु बिरवा हैं
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अर्जुन बृक्ष परैं दिखराय ||
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मिला लाग्यो नौरंगिन का
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हेला निम्बुन का दर्शाय १४
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ठेला भरि भरि अमरूतन का
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माली राजभवन को जाय ||
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केवांडा केरी उठें सुगंधे
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कहुंकहुं नागबेलिगे छाय १५
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ताही बगिया सुनवाँ खेलै
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मेलै गले सखिन के हाथ ||
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सखियाँ बोली तहाँ सुनवान्ते
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तुम नित ख्यलोहमारेसाथ १६
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पैर महावर पै तुम्हरे ना
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टिकुली नहीं बिराजै भाल ||
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द्रव्य तुम्हारे का घर नाहीं
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जो नहिं ब्याह करै नरपाल १७
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इतना कहिकै सब आलिनने
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औ करताली दीन बजाय ||
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समय दुपहरी को जान्यो जब
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तब फिरि खेलबन्द ह्वैजाय १८
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कीरति गावैं सब आल्हा की
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माड़ो लिहेनि बापका दाएँ ||
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धन्य बानफ़र उदयसिंह हैं
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आल्हा केर लहुरवा भाय १९
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ऐसी बातैं सखियाँ करतै
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अपने भवन पहुँचीं आय ||
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ताही क्षणमें सुनवाँ मन में
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अपने ठीक लीन ठहराय २०
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ब्याही जैबे आल्हा संग में
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की मरिजाब जहर को खाय ||
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छाय उदासी गै चिहरा में
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पूँछै बार बार तब माय २१
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कौन रोग है त्वरि देही माँ
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बेटी हाल देउ बतलाय ||
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पीली ह्वैगै सब देही है
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औतनकाँपिकाँपिरहिजाय २२
|
को हितकारी है मातासम
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नाता बड़ा जगत केहिभाय ||
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अब तो बाबा कलियुग आये
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माता सहैं लात के धाय २३
|
सुनिकै बातें ये माता की
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सुनवाँ चरणन शीश नवाय ||
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जो कछु भाषारहै सखियनने
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सुनवाँ मातै गई सुनाय २४
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सुनीकै बातैं सब कन्या की
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माता रही समय को देखि ||
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यकदिन ऐसा आनपहूंचा
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राजा रहा कन्यका पेखि २५
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रानी बोली तब राजाते
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हमरे वचन करो परमान ||
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ब्याहन लायक यह कन्या भए
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सोतुमजानो नृपतिसुजान २६
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सुनिकै बातैं ये रानी की
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बिजिया बेटा लीन बुलाय ||
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नाई बारी को बुलवायो
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तिनते कह्योहालसुझाय २७
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जयो मोहोबे ना टीका लै
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सब कहूँ जाउ तुरतही धाय ||
|
नाई बारी तुरतै चलिभे
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पहुंचे नगर नगर में जाय २८
|
काहू टीका को लिन्ह्यो ना
|
नैनागढ़े पहूचे आय ||
|
खबरि सुनाई सब राजा को
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नेगिनचरणशीशनवाय २९
|
जालिम राजा नैनागढ़ का
|
राजन यही विचार जीय ||
|
मारे डरके छाती धड़कै
|
कैसेहोयें तहांपर पीय ३०
|
थोरी थोरी फौजें लैकै
|
नैनागढ़ै पहूंचे आय ||
|
नजरी दीन्ह्यो नैपाली को
|
राजाचरण शीशनवाय ३१
|
सरबरि तुम्हरि का नाहीं हैं
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टीका लैयं कहौ कास भाय ||
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कुमुक तुम्हारी को आयन है
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राजन सत्यदीन बतलाय ३२
|
त्यही समैया त्यही औसरमाँ
|
औ सुनवाँ को सुनो हवाल ||
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हीरामणि सुवनाको लैके
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सुनवाँ भई रोवासिनिबाल ३३
|
चुम्यौ चाट्यो त्यहि सुवनाको
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औफिरिकह्योवचन यह गाय ||
|
मेवा खायो भल पिंजरन में
|
अब गाढ़े में होउ सहाय ३४
|
लैके पाती जाउ मोहोवे
|
देवो उदयसिंह को जाय ||
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लिखी हक़ीकत सब आल्हाको
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सुनवाँ बार बार समुझाय ३५
|
नामी ठाकुर तुम मोहबे में
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हमरो ब्याह करो अब आय ||
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नहिं मरि जायो जहर खायकै
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दूनो भाइ बानफ़रराय ३६
|
लिखिकै पाती गल सुवनाके
|
सुनवाँ तुरत दीन लटकाय ||
|
मूठी दीन्ह्यो फिरि कोठे ते
|
सुवना चला मोहोबे जाय ३७
|
चन्दन बगिया सुवना पहुँच्यो
|
तहं पर रहै उदयसिंहराय ||
|
चन्दन ऊपर सुवना बैठो
|
परिगा दृष्टि तुरतही आय ३८
|
भल चुचकास्यो उदयसिंह ने
|
आपन नाम दीन बतलाय ||
|
सुवना बैठ्यो तब हाथेपर
|
पाति छोरी लीन हर्षाय ३९
|
बांचिकै पाती तब उदन ने
|
औ सय्यद को दीन सुनाय ||
|
सय्यद आल्हासों बतलायो
|
मलखे देबै दीन बताय ४०
|
लैकै पति औ सुवना को
|
गे परिमाल कचहरी धाय ||
|
कही हकीकति सब राजा सों
|
पाती दीन उदयसिंहराय ४१
|
पढ़ीकै पाती को परिमालिक
|
मनमाँ गए सनाकाखाय ||
|
होश उड़ान्यो परिमालिक को
|
मुँहकाबिरागयो कुम्हिलाय ४२
|
बोली ना आवा परिमालिक सों
|
औ द्वाढालों लार सुखाय ||
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थर थर थर थर देहि काँपी
|
शिरसों मुकुट गिरा भहराय ४३
|
रोम रोम सब ठाढ़े ह्वैगे
|
नैनन बही आँसू की धार ||
|
धीरजधरिकै परिमालिक फिरि
|
औ मलके tan रहे निहारि ४४
|
मलखे बोले तब राजा ते
|
साँचे बचन सुनो नरपाल ||
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टीका पठयो है बेटी ने
|
सोंहिंलौटीसकैक्यहुकाल ४५
|
सुनिकै बातें मालखाने की
|
बोले तुरत रजापरिमाल ||
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ब्याधि नशायो गढ़माड़ो को
|
दूसरि ब्याधिभयोफिरिहाल ४६
|
टीका फेरो नयनागढ़ को
|
मलखे मानो कही हमार ||
|
जालिम राजा नयपाली है
|
ज्यहिघर अमरढोल सरदार ४७
|
कौन बियाहन त्यहि घर जैहै
|
ऐहै लौटि कौन बलवान ||
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टीका फेरो सब राजन ने
|
मानो कही वीर मलखान ४८
|
सवैया
|
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शान ठाढ़ी मलखान के ऊपर
आँ नहीं कछुहू नृप राखी |
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मोहिं पियार न प्राण
भुवार कहौ मैं सत्य सदाशिव साखी ||
|
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कीरतिही प्रिय विरनको
हम शान कि आन सदा मनमाखी |
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आनरहैनहिं शान कि जो
मरिजान भलो ललिते हम भाखी ||
|
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इतना कहिकै मालखाने ने
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डंका तुरत दीन बजवाय ||
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लिखिकै उत्तर उदयसिंह ने
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सुवना गरे दीन लटकाय ५०
|
उड़ीकै सुवना फिरि मोहोबे ते
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सुनवाँ पास पहूंचा आय ||
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रानी मल्हना के महलन में
|
राजा तुरत पहूंचे जाय ५१
|
हाल बतायो सब मल्हना को
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सुनतै गई सनाका खाय ||
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मलखे देवा को बुलवायो
|
सुनतै गये महल में आय ५२
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मल्हना बोली तब मलखे ती
|
बेटा हाल देउ बतलाय ||
|
कहे डंका तुम्हरे बाजे
|
कहाँ चढ़ीजाउ बानफ़रराय ५३
|
हाथ जोरिकैमलखे बोले
|
मल्हना चरणन शीश नवाय ||
|
पाती आई नैनागढ़ की
|
आल्हा तहाँ बियाहन जाएँ ५४
|
सुनिकै बातैं मालखाने की
|
मल्हनै देवै कहा सुनाय ||
|
शकुन तुम्हारे सो मलखाने
|
माड़ो लीन बाप का दाएँ ५५
|
कैसी गुजरी नैनागढ़ में
|
सो सब हाल देव बतलाय ||
|
सुनिकै बातैं ये मल्हना की
|
देवा पोथी लीन मंगाय ५६
|
लैकै पोथी ज्योतिष वाली
|
औ सब हाल दीन बतलाय ||
|
जीति तुम्हारी यहाँ हैहै
|
साँची बात कहैं हम माय ५७
|
इतना कहिकै दूनों चलि भे
|
महलन भये मंगलाचार ||
|
बांदी आँगन लीपन लागी
|
पंडित साइति रहे बिचार ५८
|
एक कुमारी तेल चढ़ावै
|
गावनलगीं सखी त्यहिकाल ||
|
माय मंतरा भे पाछे सों
|
नेगिननेग दीन परिमाल ५९
|
लैकै महाउर नाइनि आई
|
नहखुर होनलाग त्यहिबार ||
|
नाइनि मांग्यो तहं पुरवाको
|
दीन्ह्यो मल्हना परम उदार ६०
|
उबटन करिकै तन केसरसों
|
निर्मलजलसों फिरिअन्ह्वाय ||
|
कंकण बांधागा आल्हा के
|
दूलह बने बानफ़रराय ६१
|
सजी पालकी तहं ठाढ़ीथी
|
तापर बैठी शम्भू को ध्याय ||
|
कुंवा बियाहन आल्हा पहुंचे
|
मल्हना पैर दीन लटकाय ६२
|
पहिली भांवरि के फिरतैखन
|
आल्हा गह चरणको धाय ||
|
बाग़ लगावों तेरे नाम की
|
माता लेवो चरण उठाय ६३
|
ऐसो कहिकै सातों भाँवरि
|
घूमा तुरत बनाफ़रराय ||
|
मल्हना बोली फिरि आल्हा सों
|
सेयों तुमको दूध पियाय ६४
|
तासों द्यावलि सों अधिकी मैं
|
तासों पैर दीन लटकाय ||
|
पंजा फेरयो फिरि पीठी माँ
|
तुम्हरो बार न बांको जाय ६५
|
पांय लागीकै फिरि द्यावलिके
|
पालकी चढ़े बनाफ़रराय ||
|
हुकुम लगायो बधउदन ने
|
डंका बजन लाग घहराय ६६
|
घोड़ करिलिया आल्हा वाला
|
कोतल चला पालकी साथ ||
|
मलखे पपीहापर बैठत भे
|
नायकै रामचंद्र को माथ ६७
|
घोडा मनोहरा की पीठी माँ
|
देबा तुरत भयो असवार ||
|
सय्यद सिरगा पर बैठत भे
|
नाहर बनरस के सरदार ६८
|
अली अलामत औ दरियाखां
|
बेटा जानबेग सुलतान ||
|
तेग बहादुर अली बहादुर
|
बैठे घोड़ आपने ज्वान ६९
|
मीराताल्ह्न के लरिका ये
|
नाहर समरधनी तलवार ||
|
मन्नागूजर मोहबे वालो
|
सोऊ बेगि भयो असवार ७०
|
सातलाख लग फौजें सजिकै
|
नैनागढ़ को भई तयार ||
|
डंका बाजें अह्तंका के
|
उदन बेंदुलपर असवार ७१
|
सजे बाराती सब मोहबे के
|
जल्दी कूच दीन करवाय ||
|
सातरोज़ की मैजली करिकै
|
फौजें अटी धुरा पर आय ७२
|
आठ कोस नैनागढ़ रहिगा
|
तहंपर डेरा दीन डराय ||
|
तम्बू गडिगा तहाँ आल्हा का
|
बैठे सबै शूरमा आय ७३
|
ऊँचे ऊँचे तम्बू गड़ीगे
|
नीचे लागीं खूब बाजार ||
|
कम्मर छोरे रजपूतन ने
|
हाथिन हौदा धरे उतार ७४
|
तंग बछेड़न की छोरी गईं
|
क्षत्रिन धारा ढाल तलवार ||
|
बनी रसोई रजपूतन की
|
सबहिनजेंयलीन ज्यँवनार ७५
|
गा हरकारा तब तहँनाते
|
जहाँना भरीलाग दरबार ||
|
बैठक बैठे सब क्षत्री हैं
|
एकते एक शूर सरदार ७६
|
गम् गम् गम् गम् तबला गमकें
|
किन् किन् परी मंजीरन मार ||
|
को गतिबरनै सारंगी कै
|
होवै नाच पतुरियन क्यार ७७
|
खये अफिमनके गोला कोउ
|
पलकैं मूंदे और रहिजाएँ ||
|
कोऊ जमाये हैं भांगन को
|
मनमाँ रहे रामयश गाय ७८
|
उड़े तमाखू बुटवल वाली
|
धूंवना रहा तहांपर छाय ||
|
हाथ जोरि औ बिनती करिकै
|
धावन बोल्यो शीशनवाय ७९
|
अई बरातें क्यहू राजाकी
|
घूरे परीं आजही आय ||
|
आठकोस केहैं दुरीपर
|
सांची खबरि दीन बतलाय ८०
|
सुनिकै बातैं नयपाली ने
|
तीनो लड़िका लये बुलाय ||
|
जोगा भोगा औ बिजियाते
|
राजा बोल्यो बचन सुनाय ८१
|
जावो जल्दी तुम घूरेपर
|
हमको खबरि सुनावो आय ||
|
सुनिकै बातै तीनो
चलिभे
|
घूरे तुरत पहूंचे जाय ८२
|
ऊँचे टिकुरी तीनो चढीकै
|
दूरिते द्यखैं तमाशा भाय ||
|
देखिकै फौजें मालखाने की
|
तीनों गये तहाँ सन्नाय ८३
|
तीनों लौटे त्यहि टिकुरिते
|
अपने महल पहूंचे आय ||
|
भोजन केरी फिरि बिरियामाँ
|
राजै खबरि दीन बतलाय ८४
|
लगी कचहरी ह्याँ आल्हाकी
|
भारी लाग तहाँ दरबार ||
|
बैठक बैठे सब क्षत्री हैं
|
एकते एक शूर सरदार ८५
|
मीराताल्हन बनरसवाले
|
आलि खानदान के ज्वान ||
|
बड़े पियारे ते क्षत्रिन के
|
अपने धर्म कर्म अनुमान ८६
|
सच्चे साथी रहें चारों के
|
यारों मानों कही हमार ||
|
ऐसे होते जो सय्यद ना
|
कैसे बने राहत सरदार ८७
|
अली अलामत औ दरियाखां
|
बेटा जानबेग सुलतान ||
|
औरो लड़िका रहैं सय्यदके
|
एकते एक रूप गुणखान ८८
|
मन्नागुजर मोहबे वाला
|
बैठा बड़ा सजीला ज्वान ||
|
रुपनाबारी ते त्यहि समया
|
बोले तहाँ बीर मलखान ८९
|
ऐपनवारी बारी लैकै
|
राजैद्वार पहूँचो जाय ||
|
सुनिकै बाते मालखाने की
|
रुपना बोला शीशनवाय ९०
|
औरो नेगी मोहबे वाले
|
आये साथ बनाफर राय ||
|
ऐपनवारी बारी लैकै
|
द्वारे मूड कटावै जाय ९१
|
सुनीकै बातें ये रुपना की
|
बोले तुरत उदयसिंहराय ||
|
तुमको नेगी हम मानै न
|
जानै सदा आपनो भाय ९२
|
ददा बियाहन को रहि हैं ना
|
बतियाँ कहिबे को रहिजाएँ ||
|
यश नहींजावै नर मरिजावै
|
परहित देवै मूडकटाय ९३
|
स्वारथ देही तब नरकेही
|
नेही मरे न पावै चाम ||
|
सन्मुख जूझे समरभूमि में
|
जावै तुरत हरी के धाम ९४
|
बड़े प्रतापी जग में जाहिर
|
मनियांदेव मोहोबे केर ||
|
तिनके सेवक तेई रक्षक
|
रुपन काह लगावो देर ९५
|
रूपन बोला तब मलखे ते
|
दादा मानो कही हमार ||
|
घोड़ करिलिया आल्हा वाला
|
अपने हाथ देउ तलवार ९६
|
सुनिकै बातै ये रुपना की
|
मलखे घोड़ दीन सजवाय ||
|
ढाल खड्ग रुपना को दैकै
|
बैठे तुरत बनाफरराय ९७
|
बैठिकै रुपना फिरी घोड़े पर
|
ऐपनवारी लीन उठाय ||
|
चारिघरी को अरसा गुजरो
|
नैनागढ़े पहूचो जाय ९८
|
देखिकै बारी दरवानी ने
|
भारी हांक दीन ललकार ||
|
कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ
|
बोलो घोड़े के असवार ९९
|
सुनिकै बातैं द्वारपाल की
|
रूपन बोला बचन उदार ||
|
आल्हा ब्याहन को हम आये
|
नामी मोहबे के सरदार १००
|
खबरि सुनावो नैपाली को
|
फिरि तुम हमैं सुनावो आय ||
|
ऐपनवारी बारी लायो
|
ताको नेग देव पाठवाय १०१
|
सुनिकै बोलो द्वारपाल फिरि
|
तुम्हरो नेग काह है भाय ||
|
सोऊ सुनावों महराजा को
|
लादे लिहे घोड़ पर जाय १०२
|
सुनीकै बातें द्वारपाल की
|
रूपन बोला बचन उदार ||
|
चारिघरीभर चलै सिरोही
|
द्वारे बहै रक्त की धार १०३
|
नेग हमारो यहू प्यारो है
|
देवो पठे स्वई सरदार ||
|
जाही पियारो तन होवै न
|
आवै स्वई शूर अब द्वार १०४
|
सुनिकै बातें ये बारी की
|
आरी द्वारपाल ह्वै जाय ||
|
मनमें सोचै मनै बिचारै
|
मनमें बार बार पछिताय १०५
|
कैसो बारी यहु आयो है
|
नाहर घोड़ेका असवार ||
|
जालिम राजा नैपाली है
|
तासों कीं चाहै तलवार १०६
|
यहै सोचिकै द्वारपाल ने
|
औ रुपन ते कहा सुनाय ||
|
गरमी तुम्हारी जो उतरी हो
|
बोलो ठीक ठीक तुम भाय १०७
|
सुनिकै बातें दरवानी की
|
रूपन गरू दीन ललकार ||
|
नगर मोहोबा जगमें जाहिर
|
नामी मोहबे के सरदार १०८
|
तिनको नेगी मैं द्वारेपर
|
लीन्हे खड़ा ढाल तलवार ||
|
जौन सूरमा हो नैनागढ़
|
आवै देय नेग सो द्वार १०९
|
इतनी सुनिकै दरवानी ने
|
राजै खबरि सुनाई जाय ||
|
ऐपनवारी बारी लावा
|
भारी बात कहै सो गाय ११०
|
चारिघरीभर चलै सिरोही
|
द्वारे बहै रक्त की धार ||
|
जौन शूरमाहो राजाघर
|
आवै देय नेग सो द्वार १११
|
इतना सुनतै महराजाके
|
नैना अग्नि बाण ह्वै जाएँ ||
|
पूरण राजा पटनावाला
|
बोला राजै बचन सुनाय ११२
|
हम चलिजावैं अब द्वारेपर
|
बारी नेग देयं चुकवाय ||
|
इतना कहिकै चलि ठाढो भो
|
साथै औरो चले रिसाय ११३
|
सवैया ||
|
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द्वार चले तलवार लिए रत मारहि मार कुमारन पेखा |
|
|
लाल गुपाल गाहे करबाल ख्यलें जसफाग भयऊ तस भेखा ||
|
|
मार अपार जुझार किये औ गिरे रणखेत रहे नहिं शेखा |
|
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बारीकरै कब रारी नृपे ललिते मलखान कि है यह लेखा ११४
|
|
पूरन राजा पटना वाला
|
लीन्हे नांगि हाथ तलवार ||
|
सो धरि धमका त्यहि रुपनके
|
रूपन लीन ढालपर वार ११५
|
सांगी उठाई फिरि रूपन ने
|
राजै बार बार ललकार ||
|
लटुवा लाग्यो पूरन शिर में
|
औ बहिचली रक्तकी धार ११६
|
अगल बगल के फिरि मारतभा
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दायें बायें दीन हटाय ||
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ऍड़ा मसके फिरि मारत भो
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फाटक तुरत पार ह्वैजाय ११७
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गाली गाली में फिरि मारत भो
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औ बहिचली रक्तकी धार ||
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घरी चारके फिरि अरसा में
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लश्कर आय गयो असवार ११८
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लाले रंग सों भीजे दिख्यो
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फागुन टेसू के अनुहार ||
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पूँछी हकीकति तब मलखेने
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नाहर मोहबे के सरदार ११९
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कैसी गुजरी नैनागढ़ में
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रूपन हाल देउ बतलाय ||
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सुनिकै बातें मलखाने की
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रूपन यथातथ्य गा गाय १२०
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हल्ला ह्वैगा नैनागढ़माँ
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जहाँ तहाँ कहाँ लागि सबकोय ||
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ऐसे बहादुर जहांके परजा
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तहंके नृपतिकहौ कास होयँ १२१
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देखी तमाशा यहु बारी का
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राजा बार बार पछिताय ||
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बड़ी हीनता हमरी ह्वैगै
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बारी जियतनिकरिगाहाय १२२
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जोगा भोगा दोऊ लरिका
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बोले हाथ जोरि शिरनाय ||
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हुकुम जो पावैं महराजा का
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सबकी कटा देयंकरवाय १२३
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जितनी रांडें चढ़ी आई हैं
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सो बिनघाव एक ना जायें ||
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खेदिकै मारें हम मोहबे लग
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टेटूवा टायर लयं चिनाय १२४
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सुनीकै बातैं ये लरिकन की
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राजै हुकुम दीन फ़रमाय ||
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तुरत नगड़ची को बुलवायो
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तासोंबोल्योहुकुमसुनाय १२५
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बजै नगाड़ा नैनागढ़ में
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सबियाँ फौज़ होय तय्यार ||
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भोर भुर्हरे पहफाटत खन
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मारों मुह्बे के सरदार १२६
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इतना कहिकै दूनों चलिभे
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अपने महल पहूंचे जाय ||
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खेत छुटीगा दिननायक सों
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झन्डागडानिशाको आय १२७
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तारागण सब चमकन लागे
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संतान धूनी दीन परचाय ||
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परे आलसी निजनिज खटिया
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घों घों कंठ रहे घर्राय १२८
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माथ नवाबों पितु अपने को
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जो नित मिरे करें सहाय ||
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करों तरंग यहाँ सों पूरण
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पूरण ब्रह्म राम को ध्याय १२९
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आए फौजें दूनों सजिहैं
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मची हैं घोर शोर घमसान ||
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जोगा भोगा के मुर्चापर
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लड़ी हैं खूब वीरमलखान १३०
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बरातआगमनवर्णनोनामप्रथमस्तरंग
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